प्रेमचंद साहित्य के अनन्यतम अध्येता :डॉ.कमलकिशोर गोयनका

कृष्ण वीर सिंह सिकरवार


बड़े हर्ष का विषय है कि प्रेरणा त्रैमासिक पत्रिका के यशस्वी संपादक श्री अरुण तिवारी प्रेरणा पत्रिका का आगामी अंक हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध चिंतक, समीक्षक व प्रेमचंद साहित्य मर्मज्ञ के रूप में देश विदेश में विख्यात ख्यातिप्रद विद्वान आलोचक डॉ. कमल किशोर गोयनका पर केन्द्रित करना चाह रहे हैं। इससे पूर्व भी डॉ. गोयनका पर केन्द्रित कई पत्रिकाओं ने अपने-अपने स्तर से सामग्री एकत्रित कर अद्भुत अंक प्रकाशित किये हैं, परन्तु प्रेमचंद साहित्य को पढ़ने वाले लेखक व पाठकों के बीच डॉ. गोयनका द्वारा प्रेमचंद साहित्य पर किये गये शोध कार्य की लोकप्रियता इस कदर है कि पत्रिकाओं के संपादक उनके द्वारा किये गये इस कार्य को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहंचाना चाह रहे हैं। फलस्वरूप श्री अरुण तिवारी जी का यह कदम स्वागत योग्य है।


डॉ. गोयनका के अगर साहित्यिक रचनाक्रम पर अगर नजर डालें तो हम देखते हैं कि उन्होंने मौलिक साहित्यिक रचनाकर्म कम किया है, परन्तु प्रेमचंद संबंधी व प्रवासी साहित्य के ऊपर शोधकार्य के रूप में डॉ. गोयनका ने हिंदी साहित्य जगत की जो सेवा की है वह अद्वितीय है। कोई भी व्यक्ति इतना श्रमसाध्य कार्य नहीं कर सकता है। अभी भी उम्र के इस पड़ाव पर प्रेमचंद के बारे में पाठकों करना मैं उचित व श्रेयस्कर समझता हूं, क्योकि डॉ. गोयनका को उनके द्वारा किए गए विभिन्न शोधकार्यों के जरिये ही बेहतर जाना व समझा जा सकता है ।


सर्वप्रथम मैं डॉ. गोयनका के जीवन व व्यक्तित्व पर प्रकाश डालना चाहता हूं, ताकि उन्हें और नजदीक से जाना जा सके। डॉ. गोयनका का जन्म 11 अक्टूबर 1938 को बुलंदशहर (उ.प्र.) के प्रतिष्ठित जमींदारी परिवार में सेठ बद्रीनाथ गोयनका के परिवार में हुआ था, दादाजी मूलतः मंडावा, शेखावाटी राजस्थान में जन्मे थे और वहां से बुलंदशहर में आ गए थे। पिताजी श्री चन्द्रभान गोयनका महात्मा गांधी के अनुयायी थे और धार्मिक प्रकृति के सीधे सरल मनुष्य थे। आपकी प्रारंभिक शिक्षा बुलंदशहर में ही हुई थी। ग्रेजुएशन करने के बाद आप दिल्ली आ गये एवं दिल्ली में ही रात्रिकालीन कक्षाओं में एम.ए. (हिंदी) की परीक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और वहीं अध्यापन का मार्ग चुना ।


डॉ. गोयनका का साहित्य जगत में प्रवेश डॉ. नगेन्द्र के आदेश पर प्रेमचंद के ऊपर मौलिक शोधकार्य करने पर हुआ तब डॉ. गोयनका ने प्रेमचंद के ऊपर कार्य करने हेतु डॉ. नगेन्द्र को सोलह विषय दिये जिनमें से डॉ. नगेन्द्र द्वारा 'प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्पविधान' पर मौलिक शोधकार्य करने हेतु निर्देशित किया। यह शोधकार्य डॉ. गोयनका की अथक साधना, संलग्नता एवं समर्पणता की बदौलत वर्ष 1972 में प्रकाशित हुआ जिस पर उन्हें पी.एच.डी. की उपाधि मिली। इस शोधकार्य की थीसिस जमा करने में डॉ. गोयनका को 7-8 वर्ष लगे क्योंकि इन वर्षों में उनके द्वारा प्रेमचंद के संपूर्ण उपन्यासों में छिपी हुई विभिन्न प्रकार की कलाओं, उनके पात्र, उनके भाषा वैशिष्ठ आदि का बारीकी से निरीक्षण किया गया उनके द्वारा किये गये इस कार्य से वह अद्भुत जानकारियां निकलकर बाहर आईं जिनसे पाठक अभी तक अनभिज्ञ था। इस पुस्तक के द्वारा उनको साहित्य जगत में एक नई पहचान मिली व पाठकों ने इस गंभीर शोधकार्य की भरपूर प्रशंसा की। एक प्रकार से इस पुस्तक में संकलित जानकारी ने साहित्य जगत को चौंकाया भी। इस पुस्तक से पूर्व डॉ. गोयनका ने कुछेक हाइकू, कविताएं एवं कहानियां लिखी थीं जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुई थीं परन्तु 'प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्पविधान' पुस्तक प्रकाशित होते ही इसकी चर्चा साहित्य जगत में बड़े जोर शोर से होने लगी।


इस शोधकार्य के दौरान डॉ. गोयनका ने प्रेमचंद साहित्य के संदर्भ में जो तथ्य व मान्यताएं स्थापित की थीं उनसे अलग नए तथ्यों की तलाश की भी बडी संभावनाएं दिखीं अतः डॉ. गोयनका निष्क्रिय न बैठकर प्रेमचंद साहित्य पर और अधिक मौलिक शोधकार्य की संभावनाएं तलाशने लगे। इस कारण वे पूरे मनोयोग से प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा में जुट गये और इस लगन का ही परिणाम था कि उनके द्वारा हिंदी साहित्य को प्रेमचंद का वह साहित्य मिला जो अभी तक यहां-वहां पत्रपत्रिकाओं मे अचिन्हा पडा था एवं जिस पर किसी आलोचक का ध्यान नहीं गया था।


इसी अद्भुत लगन की बदौलत वर्ष 1980 में 'प्रेमचंद कुछ संस्मरण', 'प्रेमचंद और शतरंज के खिलाड़ी', वर्ष 1981 में 'प्रेमचंद-अध्ययन की नई दिशाएं', 'रंगभूमिनये आयाम' आदि प्रकाशित पुस्तकें इसी का परिणाम थीं जिसके द्वारा उन्होंने प्रेमचंद पर शोध के लिये शोधार्थियों हेतु नये दरवाजे खोल दिए एवं प्रेमचंद पर शोध करने वाले छात्रों, आलोचकों व विद्वानों की राह आसान कर दी।


इन पुस्तकों के प्रकाशन के बाद डॉ. गोयनका स्वयं को प्रेमचंद साहित्य में स्थापित करने के लिये कोई बड़ा कार्य करना चाहते थे इसलिये उन्होने 'प्रेमचंदविश्वकोश' पांच खंड की योजना का कार्य अपने हाथ में लिया। इसके लिये उन्होंने प्रेमचंद के बड़े पुत्र श्रीपतराय से इस योजना में मदद करने के लिये विचार रखा तो वे सहर्ष तैयार हो गये एवं उन्होंने मदद भी की लेकिन आगे उन्होंने मदद करने से इंकार कर दिया जिस पर डॉ. गोयनका बड़े दुखी एवं विचलित हुए परन्तु डॉ. गोयनका इतने बड़े कार्य को बीच में नहीं छोड़ना चाहते थे इस कारण उन्होंने अपने बूते पर ही इस कार्य को पूर्ण किया एवं वर्ष 1981 में प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से इस वृहद ग्रंथ को प्रकाशित करवाया। अभी इस ग्रंथ के दो खंड प्रकाशित किये गये थे एवं बाकी तीन खंडों को भविष्य में प्रकाशित होना निश्चित किया गया। प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली के लिये भी यह पहला मौका था जब उन्होंने इतना बड़ा वृहद ग्रंथ प्रकाशित किया था। यह पुस्तक वर्ष 1981 की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक साबित हुई और सभी साहित्यिक विद्वानों ने इस पुस्तक की सराहना की। डॉ. नामवर सिंह ने इस पुस्तक की गोपालराय द्वारा लिखी लंबी आलोचना अपनी पत्रिका 'आलोचना' में प्रकाशित की ।


प्रेमचंद-विश्वकोश के प्रथम खंड में प्रेमचंद की जीवनी को तारीखवार कैलेंडर के आधार पर प्रस्तुत किया गया था इसमें प्रेमचंद के 56 वर्षों के जीवन को लगभग 1500 तिथियों में बांधकर, जीवन चर्चा, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओं, अध्ययन संसार, प्रमाण-पत्र एवं नियुक्ति पत्र, आर्थिक जीवन यात्रा का विवरण, बाह्य संसार, रचना संसार, प्रकाशकों से अनुबंध एवं रॉयल्टी आदि शीर्षकों के माध्यम से प्रस्तुत किया एवं इसी खंड में प्रेमचंद की संपूर्ण हिंदी-उर्दू रचनाओं की कालक्रमानुसार सूची दी जो डॉ. गोयनका के कठिन परिश्रम एवं वैज्ञानिक सूझ-बूझ को बताती हैइस खंड में उन्होंने प्रेमचंद के उन अनेक पक्षों को पहली बार उद्घटित किया जो पाठकों तक पहुंचे ही नहीं थे। इस पुस्तक के द्वितीय खंड में प्रेमचंद की संपूर्ण हिंदीउर्दू रचनाओं को अकारादि क्रम से प्रस्तुत किया। इस खंड की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि प्रेमचंद के संपूर्ण साहित्य की जानकारी एक ही ग्रन्थ के माध्यम से प्राप्त हो जाती है और इस खंड में प्रेमचंद की लगभग 70 पुस्तकों के प्रथम संस्करणों के आवरण पृष्ठों को दिया गया था। यह लगभग पहला अवसर था जब किसी पुस्तक में प्रेमचंद के पुस्तकों के आवरण पृष्ठों की महत्ता को समझकर इसमें शामिल किया गया थाइसी कारण यह पुस्तक वर्ष 1981 की सर्वश्रेष्ठ रचना साबित हुई। हालांकि इस पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद डॉ. गोयनका पर यह आरोप भी लगाया गया कि वे प्रेमचंद को पूंजीवादी सिद्ध करना चाहते हैं, जबकि सत्य यह था कि प्रेमचंद की आर्थिक स्थिति का पूरा इतिहास दिया गया था जिससे मार्क्सवादियों का यह भ्रम भंग होता था कि प्रेमचंद गरीबी में पैदा हुए व गरीबी में ही मर गये, उनके पास कफन तक के पैसे नहीं थे।


इन सभी आलोचनाओं से न घबराकर डॉ. गोयनका ने अपनी सतत साधना को जारी रखा और इसी का ही परिणाम था कि वर्ष 1988 में भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली से दो खंडों में पुस्तक 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' प्रकाशित हुई । इस पुस्तक के द्वारा डॉ. गोयनका ने 1400 पृष्ठों का अप्राप्य साहित्य खोज निकाला था जिससे पाठक अभी तक अपरिचित था। इन पुस्तकों के प्रकाशन के बाद डॉ. गोयनका को प्रेमचंद साहित्य विशेषज्ञ व प्रेमचंद बासवेल कहा जाने लगा जो किसी भी आलोचक के लिये एक गौरवान्वित बात थी। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' नामक पुस्तक में उपन्यास, 30 अप्राप्य कहानियां, पुस्तक समीक्षाएं, प्रेमचंद के पत्र, प्रेमचंद के नाम पत्र एवं विभिन्न प्रकार के विलुप्त दस्तावेज शामिल किये गये थे जो इससे पहले अन्य कहीं भी देखने को नहीं मिले थे। इस पुस्तक की परख करते हुए राजेन्द्र यादव ने आरोप भी यह कहकर लगाये कि यह शोध नहीं बल्कि पुलिसिया तफ्तीश है, प्रेमचंद की मूर्ति को तोड़ने की साम्प्रदायिक कोशिश है या दूसरों से झटका हुआ माल है परंतु इन आरोपों की परवाह न करते हुए डॉ. गोयनका अपने सृजन कार्य में तल्लीन रहे। अभी हाल ही में इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण वाणी प्रकाशन, नईदिल्ली से प्रकाशित हुआ है जिसमे डॉ. गोयनका ने अपने अथक खोजी प्रयास से लगभग 100 पृष्ठों का नवीन अप्राप्य साहित्य जोड़कर इस पुस्तक का महत्व कहीं ज्यादा बढ़ा दिया ।


इन पुस्तकों के प्रकाशन के पश्चात् प्रेमचंद विषयक अनेक ज्ञात व अज्ञात साहित्य हिंदी जगत को मिला। प्रमुख पुस्तकों में वर्ष 1990 मे प्रेमचंद की हिंदी-उर्दू कहानियां, वर्ष 1994 में प्रेमचंद रचना संचयन, वर्ष 2002 में प्रेमचंद की देशप्रेम की कहानियां, प्रेमचंद के नाम पत्र, प्रेमचंद बालसाहित्य समग्र, वर्ष 2005 मे प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियां, प्रेमचंद और रंगभूमि उपन्यास, वर्ष 2007 मे प्रेमचंद पत्रकोष, प्रेमचंद-कहानी रचनावली वर्ष 2010 में प्रेमचंदः वाद-प्रतिवाद एवं संवाद, वर्ष 2012 मे प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन, प्रेमचंदः कहानीदर्शन, वर्ष 2013 मे प्रेमचंदः प्रतिनिधि संकलन, प्रेमचंद (मोनोग्राफ), प्रेमचंदकालजयी कहानियां, वर्ष 2014 मे प्रेमचंद-कहानी कोष, प्रेमचंद-संपूर्ण दलित कहानियां, वर्ष 2015 में 'गोदान- प्रथम संस्करण, 10 जून 1936 को प्रकाशित' मूल पाठ एवं हाल ही में सस्ता साहित्य मंडल, नईदिल्ली से प्रेमचंद का सर्वप्रचलित कहानियों का संकलन मानसरोवर को नये कलेवर में 'नया मानसरोवर' (आठ खंड) शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इस संकलन की विशेषता यह है कि इसमें कहानियों को कालक्रमानुसार संकलित कर प्रकाशित किया गया है। इस संकलन के आठों खंड में डॉ. गोयनका की भूमिका के साथ कुल 299 कहानियां संकलित की गई हैं। डॉ. गोयनका द्वारा भूमिका में दी गयी ऐतिहासिक जानकारी इस संकलन को अतिमहत्वपूर्ण बना देती है। अगर पाठकों को एक ही जगह प्रेमचंद की संपूर्ण कहानियों का रसास्वादन करना है उनके लिये यह ग्रन्थ किसी वरदान से कम नहीं हैं


___ इन पुस्तकों द्वारा कई लुप्तप्रायः सामग्री पाठकों को मिली जैसे प्रेमचंद के नाम पत्र (अनिल प्रकाशन, नई दिल्ली) नामक पुस्तक में प्रेमचंद को उनके मित्रों द्वारा लिखे गये पत्रों का संकलन कर प्रकाशित किया गया जो किसी भी महत्वपूर्ण दस्तावेज से कम नहीं है। हालांकि यह प्रेमचंद द्वारा लिखा गया साहित्य की श्रेणी में नही आता है, फिर भी इन पत्रों द्वारा कई महत्वपूर्ण घटनाओं एवं सूचनाओं की जानकारी प्राप्त होती है, जो पठनीय है। इसी तरह से डॉ. गोयनका ने वर्ष 2007 में अमित प्रकाशन, गाजियाबाद से प्रकाशित प्रेमचंद-पत्रकोश नामक पुस्तक में प्रेमचंद के लगभग संपूर्ण पत्रों को शामिल किया गया है। यह पुस्तक इन मायनों में भी ऐतिहासिक है कि इस संकलन में नये 149 पत्रों को शामिल किया गया जो इससे पूर्व हंस प्रकाशन, इलाहाबाद से अमृतराय व मदनगोपाल के संयुक्त संपादन में प्रकाशित संकलन 'चिट्ठी-पत्री भाग-2' में प्रकाशित नहीं हो पाये थे। इस प्रकार इस पुस्तक में प्रेमचंद के पत्रों को संकलित कर उन्हें हमेशा के लिये सुरक्षित कर दियायह सब डॉ. गोयनका की ही मेहनत का नतीजा था जो इस कालजयी रचनाकार के संपूर्ण पत्रों को हमेशा के लिये सुरक्षित कर दिया गया। इस कार्य को संरक्षित करने में डॉ. गोयनका को आशातीत सफलता भी प्राप्त हुई


वर्ष 2010 में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा डॉ. गोयनका के कुशल संपादन में 'प्रेमचंद कहानी रचनावली' (6 खंडों में) का प्रकाशन किया गया। इस रचनावली में प्रेमचंद की उपलब्ध 298 कहानियों का कालक्रम से सजाकर उनके प्रथम पाठ को प्रकाशित किया गया जो साहित्य जगत में एक ऐतिहासिक कार्य था, क्योंकि इस रचनावली द्वारा पाठकों को प्रेमचंद की कहानियां कालक्रमानुसार पढ़ने को मिली जो अभी तक प्रकाशित प्रेमचंद की कहानियों के किसी भी संकलन में नहीं थी। यहां तक कि प्रेमचंद के सर्वकालिक महान कहानी संकलन मानसरोवर भाग-8 में भी कहानियां बिना किसी क्रम के संकलित की गई थीं जिससे कहानियों का कालक्रम बिखरता है और पाठकों को समझ नहीं आता कि कहानी किस वर्ष में प्रकाशित की गयी थी। परन्तु 'प्रेमचंद कहानी रचनावली' (6खंड) में पाठक उपलब्ध 298 कहानियों को कालक्रम से पढ़ सकता है जो कि एक अभी तक का महत्वपूर्ण कार्य था। इस संकलन में ज्यादातर कहानी प्रथम संकलनों से प्रस्तुत की गई है, जिस कारण वर्तमान समय के कहानी संकलनों में प्रकाशित प्रेमचंद की कहानियों के बीच का भेद भी पाठक आसानी से समझ सकता है क्योंकि प्रथम संस्करण में प्रस्तुत कहानी के बाद प्रेमचंद के कई कहानी संकलन देखने को मिले एवं प्रेमचंद साहित्य को कॉपीराइट एक्ट से मुक्त हो जाने के बाद देश के विभिन्न प्रकाशकों ने प्रेमचंद की कहानियों के कई संकलन प्रकाशित किये जिसमें मुद्रण की अनेक अशुद्धियों के कारण कई जगह कहानियों के पाठों में भिन्नता आई। इस कारण यह संकलन प्रथम पाठ की वजह से अपना एक अलग महत्व रखता है, इस संबंध में अभी तक किसी भी आलोचक की दृष्टि नहीं गई थी और न ही उनके कहानियों के प्रथम पाठ को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया था।


इस रचनावली के प्रकाशन पश्चात् डॉ. शिवकुमार मिश्र ने तो साहित्य अकादमी के भवन में डॉ. गोयनका को गले से लगा लिया और अमरता का वरदान देते हुए कहा कि गोयनका तुम प्रेमचंद कहानी रचनावली जैसे कार्य करके अमर हो गये होयह एक वामपंथी लेखक की दक्षिणपंथी लेखक के प्रति प्रेमचंद संबंधी कार्य की श्रेष्ठता और महत्ता की स्वीकृति थी


__ वर्ष 2012 में नटराज प्रकाशन, नईदिल्ली द्वारा डॉ. गोयनका के कुशल संपादन में 'प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन' पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसमें प्रेमचंद की उपलब्ध 298 कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन किया गया से सूची नहीं बना पाया था यह सूची इस पुस्तक में वैज्ञानिक तरीके से दी गयी है जो अभी तक फैली प्रेमचंद की कहानी सूची के संबंध में कई रहस्य खोलती है यह अभी तक की स्पष्ट व संपूर्ण सूची है जिसके द्वारा पाठकों को कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त होती हैं। इस पुस्तक को पाठकों द्वारा बेहद पंसद किया गयाजिसके फलस्वरूप डॉ. गोयनका को वर्ष 2014 में व्यास सम्मान के लिये चुना गया है।


के.के. विडला फाउन्डेशन की ओर से साहित्य के क्षेत्र में तीन बड़े साहित्यिक सम्मान व पुरस्कार दिए जाते हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित किसी भी भारतीय भाषा में पिछले दस वर्षों में प्रकाशित भारतीय नागरिक की उत्कष्ट साहित्यिक कृति के लिए सरस्वती सम्मान और राजस्थान के हिंदी व राजस्थानी लेखकों के लिए बिहारी पुरस्कार दिया जाता है, जबकि सरस्वती सम्मान के बाद सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित व्यास सम्मान पिछले दस वर्षों में प्रकाशित भारतीय नागरिक की उत्कृष्ट हिंदी कृति के लिए प्रतिवर्ष दिया जाता है। इस पुरस्कार के तहत ढ़ाई लाख रुपये की नगद धनराशि व प्रशंसा पत्र प्रदान किया जाता है। वर्ष 1991 में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई थी।


यह पाठकों के बीच डॉ. गोयनका की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की लोकप्रियता ही है कि जिन पुस्तकों के प्रथम संस्करण समाप्त हो गये थे उनको पुनः पाठकों एवं शोधार्थियों हेतु द्वितीय संस्करण प्रकाशित कराने हेतु विवश होना पड़ा। अब पाठक उनकी कुछ प्रसिद्ध पुस्तकों के द्वितीय संस्करण के माध्यम से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान कर सकता है। हाल में जिन पुस्तकों के द्वितीय संस्करण प्रकाशित हुए हैं उनका विवरण इस प्रकार है-(1) वर्ष 1974 में सरस्वती प्रेस, नईदिल्ली से प्रकाशित शोध ग्रन्थ 'प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्पविधान' का द्वितीय संस्करण यश पब्लिकेशंस, नईदिल्ली से प्रकाशित। (2) वर्ष 1980 में सरस्वती बिहार, नईदिल्ली से प्रकाशित 'प्रेमचंद-कुछ संस्मरण' का द्वितीय संस्करण सामयिक प्रकाशन, नईदिल्ली से प्रकाशित। (3) वर्ष 1980 में पूर्वोदय प्रकाशन, नईदिल्ली से प्रकाशित 'प्रेमचंद और शतरंज के खिलाड़ी' का द्वितीय संस्करण यश पब्लिकेशंस, नईदिल्ली से प्रकाशित (4) वर्ष 1990 में भारतीय ज्ञानपीठ, नईदिल्ली से प्रकाशित 'प्रेमचंद की हिंदी-उर्दू कहानियां' का द्वितीय संस्करण प्रभात प्रकाशन, नईदिल्ली से प्रकाशित(5) वर्ष 2002 में निर्मल पब्लिकेशंस, नईदिल्ली से प्रकाशित 'प्रेमचंद- देशप्रेम की कहानियां', का द्वितीय संस्करण अनिल प्रकाशन, नईदिल्ली से 'प्रेमचंद-राष्ट्रप्रेम की कहानियां' शीर्षक से प्रकाशित । (6) वर्ष 2002 में मेधा बुक्स, नईदिल्ली से प्रकाशित 'प्रेमचंद- बालसाहित्य समग्र', का द्वितीय संस्करण यश पब्लिकेशंस, नईदिल्ली से 'प्रेमचंद- सम्पूर्ण बालसाहित्य' शीर्षक से प्रकाशित।


डॉ. गोयनका बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं उन्होंने प्रेमचंद साहित्य पर तो लिखा ही बल्कि अन्य लेखकों पर भी कई बेहतरीन पुस्तकों का संकलन संपादन किया जिनमें प्रमुख हैं-प्रभाकर माचवे-प्रतिनिधि रचनाएं, जगदीश चतुर्वेदी-एक विवादास्पद रचनाकार, जिज्ञासाएं मेरी-समाधान बच्चन के, रविन्द्रनाथ त्यागी-प्रतिनिधि रचनाएं, यशपाल-कुछ संस्मरण, लघुकथा का व्याकरण, मंजल भगत-समग्र कथा साहित्य एवं गांधी-पत्रकारिता के प्रतिमान, हजारी प्रसाद द्विवेदी-कछ संस्मरण आदि विश्वव्यापी लेखकों के ऊपर अपने विचार व्यक्त किए एवं उनका अमूल्य साहित्य देश के हिंदी पाठकों को उपलब्ध करवाया।


___डॉ. गोयनका ने प्रवासी साहित्य पर भी काफी कुछ लिखा व मॉरिशस के हिंदी लेखक अभिमन्यु अनंत के ऊपर बेहतरीन पुस्तकों को हिंदी पाठकों को उपलब्ध करवाया जिनमें प्रमुख अभिमन्यु अनत-एक बातचीत, अभिमन्यु अनंत-प्रतिनिधि रचनाएं, अभिमन्यु अनत-समग्र कविताएं, मॉरिशस की हिन्दी कहानियां, मॉरिशस के राष्ट्रकवि, बृजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर' काव्य रचनावली एवं हिंदी का प्रवासी साहित्य आदि के द्वारा उन्होंने भारत से बाहर रह रहे प्रवासी साहित्य को उपलब्ध करवाया


इतनी बेहतरीन पुस्तकों की रचना करने वाले डॉ. गोयनका की सतत साधना अभी जारी है तथा कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन होना शेष है, जिनमें प्रमुख हैंप्रेमचंद उपन्यास रचनावली, प्रेमचंद विश्वकोष के शेष तीन खंड एवं प्रेमचंद की कालजयी कहानी कफन पर एक पुस्तक, प्रेमचंद-भारतीयता की पहचान आदि पुस्तकों पर डॉ. गोयनका की साधना जारी है। अगर प्रेमचंद साहित्य पर किसी को अपना शोधकार्य करना है तो उसे डॉ. गोयनका की इन पुस्तकों से गुजरना ही पड़ेगा।


___ अपनी इस साहित्यिक यात्रा के दौरान डॉ. गोयनका के ऊपर कई प्रकार के आरोप भी लगे किसी ने उन्हें सेठ बताया और कहा कि वे प्रेमचंद की दुकान लगा कर बेच रहे हैं, परन्तु डॉ. गोयनका इन आरोप से विचलित नहीं हुये व अपने कार्यों में लगे रहे। यह सब सोचकर बड़ा अटपटा व विचित्र ही लगता है कि जीवन के 78 वर्ष पूर्ण करने वाला व्यक्ति कैसे इतना कार्य कर सकता है, परन्तु यह सत्य है कि अभी भी डॉ.गोयनका निरतंर कार्य करने में लगे हुए हैं एवं देश के कालजयी लेखक प्रेमचंद एवं अन्य लेखकों के लुप्तप्रायः साहित्य को बचाने के लिये दृढ़ संकल्परत है, हम सभी ईश्वर से उनकी लंबी आयु के लिये प्रार्थना करते हैं वे हमेशा स्वस्थ्य रहें व खुश रहें तथा कामना करते हैं कि वे इसी तरह लुप्त हो रही साहित्यिक सामग्री को बचाने के लिये अपना लेखन कार्य करते रहें व देश के पाठकों को सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों से उनका मार्गदर्शन करते रहे। मैं डॉ. गोयनका को उनके अथक परिश्रम और सार्थक प्रयास के लिये हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई देता हूं।