कमल किशोर गोयनका और मुक्तिबोध

संस्मरण


डॉ.गंगा प्रसाद बरसैया


श्री कमल किशोर गोयनका और मुक्तिबोध पर विशेषांक प्रकाशित करने योजना बना रहे हैं। दोनों महान विभूतियां हैं जिनका साहित्यिक योगदान ऐतिहासिक महत्व का है। गोयनका जी ने प्रेमचन्द पर सतत परिश्रम कर जितनी नई जानकारी खोजकर संकलित कर प्रकाशित की है, उतना महत्वपूर्ण कार्य उनके पुत्र-परिजन भी नहीं कर सके। यदि प्रेमचन्द जीवित होते तो शायद वे भी इतनी जानकारी न दे सकते।


गोयनका जी प्रेमचंद के ही नहीं, साहित्य के सुधी विद्वान हैं और अपनी बात बड़ी निर्भीकता और प्रामाणिकता से व्यक्त करते हैं। आये दिन कतिपय लेखक चिन्तक उन पर आक्षेप करते हैं किंतु ये अपने सटीक उत्तरों से आक्षेपकर्ताओं का मुखौटा उतारने से नहीं चूकते। वैसे वे अत्यन्त सहज, विनम्र और व्यावहारिक हैं। लेखन के साथ वे वक्तव्यों में भी कुशल और दक्ष हैं। विषय के साथ पूरा न्याय करते हैं।


गोयनका जी पत्राचार में भी अत्यन्त उदार हैं। तमाम व्यस्तताओं के बावजूद वे पत्रों का उत्तर अवश्य देते हैं। पत्र चाहे परिचित के हों या अपरिचित के। यह मेरा स्वयं का अनुभव है। मैंने उन्हें अपनी तीन पुस्तकें भेजीं। उनका मेरा कोई निकट का परिचय नहीं है। उनके लेखन और शोधकार्य से मैं अत्यधिक प्रभावित हूं। उन्हें आयोजनों में सुनने का भी अवसर मिला है। अपरिचय के बावजूद उन्होंने मेरी तीनों पुस्तक पर अपनी सटीक प्रतिक्रिया व्यक्त की। पत्रों को पढ़कर जाना जा सकता है कि उनमें औपचारिकता नहीं, अपितु गंभीरता से व्यक्त कर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यहां मैं उनसे प्राप्त तीनों पत्र प्रस्तुत कर रहा हूं। पहला पत्र उन्होंने 26.03.09 को मेरी पुस्तक रचना अनुशीलन पर भेजा जो इस प्रकार है।


मान्य श्री गुप्ता जी


चित्रकूट में आपने कृपा करके रचना अनुशीलन पुस्तक दी थी। मैं इसके लिए अनुग्रहीत हूं।


_ 'रचना अनुशीलन' पुस्तक समीक्षा का ग्रंथ उसमें 46 पुस्तक-समीक्षायें हैंउनमें प्रायः सभी प्रकार की विधाओं की पुस्तक हैं। इतनी पुस्तक-समीक्षा वाली पुस्तक इसके पूर्व मैंने हिन्दी में नहीं देखी। यह समीक्षक के सहृदय तथा तटस्थ होने का प्रमाण है कि वाद, क्षेत्र जाति के किसी पूर्वाग्रह के बिना वह पुस्तकों की समीक्षा करता है और अपने मन पर पड़ी प्रतिक्रियाओं को शब्दबद्ध करता है। यह कृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें छोटे कस्बों, शहरों के लेखकों की कृतियों को भी पूरे सम्मान के साथ देखा-परखा गया है। महानगर में तो लेखक बिकते हैं समीक्षक गुटबन्दी में फंसे हैं और केवल अपने हित में मग्न है। यह समीक्षा की अराजकता है। 'रचना अनुशीलन' इस अराजकता को तोड़ती है और समीक्षा का एक पारद परिवेश निर्मित करती है। ऐसे सहृदय समीक्षकों का सर्वत्र स्वागत होना चाहिए और लेखकों को भी समझना चाहिए कि आयोजित समीक्षाओं से यश प्राप्त नहीं होता है। मैं डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया की इस कृति का स्वागत करता हूँ और उनकी समीक्षा-नीति को मूल्यांकन की एक कसौटी मानता हूं।


सादर विनीत


कमल किशोर गोयनका


मेरी एक दूसरी पुस्तक 'खरी-खरी' पर अपनी राय व्यक्त करते हुए अपने दिनांक 25-05-10 के पत्र में वे लिखते हैं -


मान्य श्री बरसैंया जी,


'खरी-खरी' मिलीधन्यवाद । मैं भी खरी-खरी बातें लिख रहा हूं। आपने भी क्या खूब खरी-खरी लिखा है-जीवन के बारे में और आदमी के बारे में, नैतिक मूल्यों और अपराधों के बारे में। इनका खरापन जो मजा देता है जो रसास्वादन कराते , वह जीवन को समझने और देखने की अमृत-दृष्टि देता है। खरी-खरी बातें मनुष्य को चेतावनी देती है, यथार्थ का ज्ञान कराती हैं और एक अच्छे मनुष्य बनने की चेतना उत्पन्न करती हैं। ऐसा खरापन ही अनुभूतियों को साहित्य बनाता है और मनुष्य को शुभ संदेश देता है। यद्यपि ये दैनिक अखबार के लिए लिखी गई थी किन्तु इनमें समसामयिकता के साथ भविष्य में भी सार्थक बने रहने के गुण हैंइतनी खरी-खरी कहने के इस साहस के लिए आपका अभिनन्दन और बधाई। आपने एक कवि के धर्म का पूरा पालन किया है- अपने समय के सत्य के उद्घाटन के साथ समाज के उन्नयन के लिए यह सृष्टि की गई।


शुभकामनाओं के साथ आपका


कमल किशोर गोयनका


मैंने एक और पुस्तक 'संवाद : साहित्यकारों से' श्री गोयनका जी को भेजीउन्होंने मुझे सम्मान के साथ संबोधित करते हुए अपनी प्रतिक्रिया दिनांक 12-11-13 को अपने इन शब्दों में प्रेषित की जो उनकी विनम्रता और विद्वता का द्योतक है।


मान्य डॉ. बरसैंया जी,


आप आयु में मुझसे बड़े हैं, अत: मान्य हैं, सम्माननीय हैं।


आपकी पुस्तक। पत्र मिले। धन्यवाद। हिन्दी में पत्रों की बड़ी उपेक्षा होती हैकुछ ही लेखकों के पत्र छपे हैं तथा लेखकों को लिखे गये पत्र तो और भी कमआपने अपने नाम लिखे-पत्रों का संकलन निकालकर पत्र-साहित्य को विकसित किया है। पत्रों में इतिहास जीवित रहता है, पारस्परिक संबंधों की सचाइयां होती हैं और साहित्य का परिदृश्य भी साफ होता है। मैं यह पत्र पढ़ गया हूँ और कह सकता हूं कि इनमें आपका व्यक्तित्व उभरता है। आपकी साहित्य-साधना का बिम्ब बनता है और पत्रोत्तर देने वाले लेखकों का चरित्र भी सामने आता है। ये पत्र मूल्यवान हैं और भविष्य में किसी भी शोधार्थी के काम आ सकते है और सबसे बड़ी बात इन्हें प्रकाशित देखकर आपको भी अत्मिक प्रसन्नता हुई होगी। मैं 11-10 को 75 वर्ष का हो गया हूं।


शुभकामनाओं के साथ आपका


कमल किशोर गोयनका


आज जब अनेक पदधारी, विख्यात साहित्यकार अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर पत्रों का उत्तर नहीं देते, उपेक्षा करते हैं तब गोयनका जी जैसे साहित्यसाधक अपने सहज औदार्य का परिचय पत्रोत्तर देकर देते हैं। यही नहीं, प्राप्त कृतियों के साथ पूरा न्याय करते हैं।