इसलिए बड़े कवि हैं कि....

 


सूरज पालीवाल


बड़ी नदी जहां से भी गुजरती है, वहां केवल हरा-भरा ही नहीं करती बल्कि लोगों के अंदर जिजीविषा भी पैदा करती चलती है। जीवन पानी के बिना कुछ भी नहीं है और पानी का दृश्यमान उद्गम है। हिंदी के वरिष्ठ कवि प्रेमशंकर रघुवंशी की कविताओं को पढते हए मझे हमेशा नर्मदा की कल-कल धारा याद आती है। नर्मदा के किनारे रहने वाला कवि कैसे उसकी पवित्र धारा से ध्वनि, ओज और माधुर्य की भाषा सीखता है, यह जानने के लिए प्रेमशंकर रघुवंशी की कविताओं के पास जाना होगा। भवानी भाई के बाद नर्मदा और सतपुड़ा के पहाड़ों पर यदि किसी कवि ने गहरे डूबकर कविताएं लिखीं हैं तो वे रघुवंशी जी हैं। अर्सा हुआ भाई विजेन्द्र की 'कृति ओर' पत्रिका के माध्यम से मैं रघुवंशीजी के संपर्क में आया। जीवन में कई बार ऐसा होता है कि आप जिस कवि को बहुत चाव से पढ़ते रहे हों, यदि आप उसके संपर्क आयें तो वे पढ़ी हुई कविताएं अपने नये अर्थ खोलती दिखती हैं। प्रेमशंकर रघुवंशी से दूरभाष पर बातें करके, उनकी कविताएं या गद्य में उनका लिखा पढ़कर लगता है जैसे बहुत ही स्नेह के साथ वे आपके पास हैं। अपने मन का सब कुछ उड़ेल देने को व्याकुल पानी की तरह हमेशा निर्मल मन और सतपुड़ा के पहाड़ों की तरह बहुत बड़े और दृढ़ दिखाई दिये हैं। उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी वे थके और बुझे नहीं हैं बल्कि यह कहूं कि अंदर एक ऐसी ज्योति से ऊर्जस्वित हैं, जिसे वे अपनी कविताओं में प्रवाहित करना चाहते हैं। एक कवि अपनी कविताओं में सुंदर और अपने से ज्यादा मानवीय संसार की रचना करता है, उसे पढ़ना लोक के चिरंतन सुख से जोड़ता है।


प्रेमशंकर रघुवंशी की कविताओं का संसार विरल रूप से बहुआयामी हैअधिकांश कविताएं संघर्ष की हैं। यह जीवित और जागृत मनुष्य का मूल स्वभाव है। संघर्ष ही है जो कबीलाई जीवन को आधुनिक विचार और विज्ञान की दुनिया तक लाया है। समय की धारा को संघर्ष ने ही मोड़ा है और आज तक की कविता इसे अपने शब्दों में रूपायित करती रही है। रघुवंशीजी की कविताओं में यह संघर्ष बाहरी या दिखाऊ नहीं है बल्कि छोटे-छोटे रूपों में बड़ा बनता है। लोक के दैनंदिन जीवन और उसके संघर्ष को रघुवंशीजी की कविताएं बड़े कैनवास पर ऐसे उकेरती जैसे वे समस्याएं एक गांव या एक आदमी की न होकर हम सबकी हैं। इसलिए वे अपनी वसीयत नर्मदा को' कविता में लिखते हैं-मैंने/वसीयत में लिख दिया/राष्ट के नाम-अपना राष्ट्रगीत/राष्ट्रध्वज/राष्ट्रभाषा और संविधान अपना/ लिख दिया/ विश्व के नाम/चांद तारे/हवा पानी प्रकाश पर्यावरण/और अंत में/सबके लिए सृजन के संकल्प और प्रार्थनाएं अनंत/नहीं लिखा/विनाश का कोई भी शब्द/किसी के लिए मैंने सौंप दी/ अपनी वसीयत नर्मदा को/ जो अमर कंठ में धारण किये/ बहती रहेगी समुद्र तक सृजन के साथ। यह कविता विश्व कविता है क्योंकि इसमें विश्व के लोगों के नाम चांद, तारे, हवा, पानी, प्रकाश और पर्यावरण की वसीयत अपनी विश्वसनीय नर्मदा को सौंपी गई है। नर्मदा पर कवि सबसे अधिक भरोसा करता है। वसीयत तो उसी के नाम की जाती है, जिस पर यह विश्वास हो कि उसके बाद वह उसकी इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सकेगा। यह विश्वास कवि को केवल नर्मदा नदी पर है इसलिए कि जन्म के साथ मां और दादी से उसने नर्मदा के विश्वास की कहानियां सुनी है और बाद में उसे स्वयं अनुभव किया है। इस कविता में धरोहर मनुष्य जीवन को बचाये रखने वाली उन्हीं आवश्यक चीजों की नहीं है, जो मनुष्य जीवन के लिए अपरिहार्य हैं बल्कि एक बात कवि और रेखांकित करना चाहता है और वह है सृजन के संकल्प । सृजन के संकल्प की जिजीविषा के संकल्प हैं, कवि उन्हें अपने परिवारजनों को नहीं सौंपता. अपने आसपास के लोगों और साहित्य के आलोचकों को नहीं सौंपता बल्कि अपनी घर गांव की सलिला नर्मदा मां को सौंपता है। यह विश्वास कितना दृढ़ और विरल है। इस प्रकार का विश्वास केवल कवियों के ही पास हो सकता है। वे आजीवन सृजन के प्रति संकल्परत रहते हैं और जाने के बाद भी यह भरोसा लेकर जाना चाहते हैं कि यह सृजन हमेशा चलता रहेगा। उनकी कविता की सार्थकता संसार के बाधारहित सृजनरत रहने में है।


संघर्ष की बातें अधिक करने से मानवीय भावों की धारा सूख जाती है। दरअसल संघर्ष करने और संघर्ष की बातें करने में बहुत बड़ा अंतर है जिसे रघुवंशीजी की कविता में स्पष्ट देखा जा सकता है। संघर्ष की अधिक बातें कविता को नारे का रूप देती हैं और मानवता के लिए किये जाने वाले संघर्ष कविता को और अधिक मानवीय बनाते हैं। रघुवंशीजी की कविताएं अभाव और शोषण के रूप को जब जब उभारती हैं, तब-तब अधिक वोकल और लाउड दिखाई देती हैं लेकिन एक स्रोता उनके मन में है जो उन्हें उन भावनाओं को व्यक्त करने के लिए आकुल-व्याकुल किये रहता है जो सभ्यता के विकास के साथ दबा या ढंक दी गई है। रघुवंशीजी बार-बार वहां चक्कर लगाते दिखते हैं इसलिए बार-बार उन्हें बहुत बारीक ढंग से उकेरते भी हैं। यह विरल है कि बाहरी दुनिया के अभावों के प्रति जवाबदेही होते हुए मनुष्यता के अंदर से सूख रहे सोते को भी फिर-फिर बाहर लाने का उपक्रम करना। कवि का मन यहां रमता है और अधिक रमता है। इसलिए स्त्री पर लिखी गई उनकी कविताओं में जो मानवीय रूप देखने को मिलता है, वह कवि की भावुकता का नमूना नहीं है बल्कि उस जीवनदृष्टि का प्रसार है, जिसने कवि को कवि बनाये रखा है। स्त्री-विमर्श के इस दौर में जहां स्त्री केवल देह मात्र बनाकर रख दी गई है कवि उसे एक ऐसी स्त्री के रूप में चित्रित करता है, जो समग्र रूप में जीवन का संदर और आकर्षक रूप है- 'आऊँ तब घर ही रहना/ उसी तरह मस्कराते मिलना/ जैसे कि हर वक्त मिला करते थे/आते ही देखूगा तुम्हारी आंखें/जिनमें हर वक्त प्यार की झील हुआ करती थी/ आते ही लिपट जाना चाहूंगा इतना कि आती जाती ऋतुओं की तरह/हमारे बीच कोई संधि तक न रहे और हां मेरे आने के पहले/ उसी तरह लीप पोतकर रखना घर/उसी तरह पूरकर रखना-आंगन में चौक/ जैसा कि हरेक पर्व के आगमन पर होता रहा है। यह कविता घरेलू और निजी प्रेम की कविता है, लेकिन इसका विस्तार सीमातीत है। यह केवल ऋतुओं की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं है अपितु उन सीमाओं का भी निषेध है जो स्त्री के अपने त्याग और समर्पण की उपेक्षा करते हैं। अपनी पत्नी से कहे हए संदेश जब पर्व और त्यौहारों का रूप ले लें तब कविता का भाव विस्तार कालातीत हो जाता है। प्रेमशंकर रघुवंशी की यह कविता एक ओर परंपरा बोध का अहसास कराती है तो दूसरी ओर उसका सघन विस्तार करती है। यह आना एक मनुष्य का आना है एक स्त्री के पास, इतिहास में ऐसे कितने पुरुष बाहर से घर आये होंगे, दुनियाभर का माल असबाब भी लाये होंगे। एक व्यापारी जब घर आता है, तब किस तरह लदा हुआ आता है पर वह ऐसा संदेश अपनी स्त्री को नहीं लिखता। इसलिए कि स्त्री के प्रति उसके मन में इस प्रकार के भाव नहीं आते, वह अपने आने को परदेश से मात्र आना समझता है। घर उसके लिए वह नहीं है जो एक कवि के लिए है, जहां एक स्त्री अपनी पूरी परंपरा में अपने प्रिय की प्रतीक्षा कर रही है। उसे पता है एक स्त्री और एक पुरुष के मिलन से ही घर बनता है। अकेली स्त्री का होना घर को पर्व और त्यौहार ही ऊष्मा नहीं देताआजकल तो अपने आधुनिक स्वर्ग अमेरिका तक से लौटते हुए कोई इस प्रकार के संदेश नहीं लिखता। जब सब बाजारू हो जाये तब ऐसी भाषा और ऐसे संदेश विरल हो जाते हैं। रघुवंशीजी ने उन मानवीय संवेदनाओं को बचाये रखा है, जो मनुष्य जीवन के लिए अपरिहार्य हैं । इसलिए वे कविता में यह वचन लेते हैं कि मैं जब घर आऊँ तो घर पर ही मिलना और सामान्य रूप में नहीं बल्कि मुस्कुराते मिलना। और जब मैं तुम्हारी आंखों में डूबूं तो ऐसा डूबूं कि ऋतुओं के बीच की संधि का भी पता न चले और हां, जैसे आवश्यक बात जो पहले कही जाने थी भूल गये हों फिर से कहते हैं घर लीप पोतकर रखना। कहना न होगा कि कच्चे घरों में लीपना पोतना शुभ माना जाता है। यह कार्य आज भी गांवों में दीपावली से पहले आवश्यक रूप से होता है और आंगन में चौक पूरकर रखना जो किसी पर्व या त्यौहार पर शुभ माना जाता हैयह केवल सूचना भर नहीं है बल्कि एक स्त्री के प्रति प्रेम और विश्वास की भावना की अभिव्यक्ति है। इसी तरह की एक और कविता में रघुवंशीजी 'संम्हाले रखना ठीक से हंसी अपनी' में अपनी प्रिया की हंसी में संसार की जीवंतता देखते हैं। वे मानते हैं कि उसके इस प्रकार के हंसते रहने से ही दुनियाभर के संकट दूर होते आये हैं। यह विश्वास अनुभवों से उपजा है। इस प्रकार की स्वकीया प्रेम की कविताएं केदारनाथ अग्रवाल के बाद प्रेमशंकर रघुवंशीजी ही लिख पाये हैं। घरपरिवार के प्रति इस प्रकार का लगाव और अथाह विश्वास ऊपर से लादा नहीं जा सकता, अंदर से उपजता है और सारे व्यक्तित्व पर छा जाता है। यह विश्वास है तो घर है वरना घर और बाहर में अंतर ही क्या रह जाता है? रघुवंशीजी की ये कविताएं घर के होने के अहसास और घर के बने रहने के विश्वास से परिपूर्ण है। मनुष्य के विकास के साथ घर बसाने की इच्छा मनुष्य मात्र की इच्छा रही है, जिनके अपने घर नहीं होते या घरों में घर जैसी प्रतीति नहीं होती, वे आजीवन आधे अधूरे रहते है, उनकी कविताओं के शब्द इस प्रकार का भरोसा नहीं दिला पाते। परस्पर भरोसा दुनिया का अनमोल खजाना है। रघुवंशीजी के पास घर भी है और घर को संभाले रखने वाला प्रेम भी, इसलिए वे लिखते हैं- अजीब है/हंसी की तासीर/कि जो हल्कीसी/मुस्कान से शुरू होकर/खनखनाती रहती देर तक/ और बिछ जाता/दूर तक बसंत/ गजब का हौसला है/हंसी में/कि कोई भी पहाड़-घाटी/बाधा-व्यवधान/अवसाद-निराशा/ रोग शोक/बल्कि मृत्यु तक के टूट/जाते फंदे/यह हंसी ही है। सिर्फ हंसी/कि जिसका छोर थामे/दिन की शल्यक्रिया कराके/लौट आया घर/जहां कुशलक्षेम पूछने वालों को/ मुझसे पहले/ तुम्हारी खिलखिलाती हंसी/देती रही जवाब।


प्रेमशंकर रघुवंशी की इन कविताओं को पढ़ते हुए पारिवारिक जीवन का सघन चित्र बनता है, जिसमें पति-पत्नी के परंपरागत संबंधों और उनके परस्पर विश्वास को जिस तरह उकेरा गया है, वह कविता को और अधिक लोकजीवन से जोड़ता है ऐसे समय में जब परिवार टूट रहे हैं और स्त्री अपनी स्वाधीनता के नाम पर देह की स्वाधीनता को ही चरम स्वाधीनता मान बैठी है। हमारे साहित्य में भी और विशेषकर कथा साहित्य में जिस प्रकार की स्त्री देह की स्वाधीनता की बात हो रही है, रघुवंशी जी की कविताएं उस विमर्श को नकारती हैं। ये कविताएं आज की हैं इसलिए अतीत में न जीती हैं और न अतीत का गुणगान करती हैं। कई बार कवि अतीत या पौराणिक आख्यानों का आसरा लेकर उदाहरण के रूप में उनका इस्तेमाल करते हैं पर रघुवंशीजी जानबूझकर ऐसा नहीं करते। किसी स्त्री को एक पत्नी का रूप पाने के लिए किसी सीता, सावित्री की आवश्यकता नहीं है, वह स्वयं में एक उदाहरण बन सकती है। रघुवंशीजी की कविताओं में आई स्त्रियां भी ऐसी ही हैं जो अपने आपमें संपूर्ण हैं। घर परिवार के सघन और विरल चित्र ही इस छीजते मानवीय संसार में कविता को बड़ा बनाते हैं।


एक बड़े कवि की पहचान लगातार एक जैसी कविताएं लिखने से नहीं होती है। उसकी महारत या संवेदना के विरल होने का पता कई दृश्य-अदृश्य विषयों पर लिखने से होता है, हो सकता है। विषय बदलने पर कई बार भाषा साथ छोड़ देती है तो कई बार कहन शैली। कविता जब अनुभवों के गह्वर प्रदेश से आती हैं तो अकेली नहीं आती, अपनी भाषा और अपना नयापन भी साथ लेकर आती है। प्रेमशंकर रघुवंशी की कविताओं के अलग-अलग तेवर उनके अनुभव विस्तार का पता देते हैं। बहुत से ऐसे विषयों पर या ऐसी मनः स्थितियों पर जिन पर कविताएं लिखना कठिन है उन पर उसी तीव्रता के साथ लिखकर रघुवंशीजी ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। जैसे उनकी एक कविता 'असल पहचान' है संसार के/ सबसे मजबूर/आदमी के पास जाओ/ताकत की/असल पहचान मिलेगी वहां। दुनिया भर से/ दुनिया भर से लुटे पिटे के पास जाओ/असल संपदा की असल पहचान मिलेगी वहां/ दिगंबर के/करीब तो पहुंचो/तमाम कपड़े पहने/ नंगे लगोगे वहां।/ गूंगे से/ बातें करके देखो/नमक के असल स्वाद की/असल पहचान मिलेगी/और झांक सको तो/अंधों की पलकों में झांककर देखो/वहां कितनी ही भागवतें/सहस्त्र पदों से/दृश्यमान हैं काव्य रसों की तरह'-कविता की विशेषता यह है कि प्रत्येक पद में दो विरोधी स्थितियों को रखकर जीवनदृष्टि को स्थापित किया गया है। मजबूर आदमी के पास असल ताकत, लुटे-पिटे आदमी के पास असल संपदा, दिगंबर के सामने खड़े होने पर तमाम कपड़े पहने होने के बावजूद नंगेपन का अहसास, गूंगे से बातें करते समय नमक की असली पहचान का पता चलना तथा अंधों की आंखों में अनेक भागवतों का दृश्यमान होना, ये सब असामान्य स्थितियों में सामान्य सत्य से प्रगटीकरण हैं। कविता की ताकत यह है कि हम जिन लोगों को उनके असली रूप में पहचान पाने में असमर्थ होते हैं, जिन्हें शारीरिक अक्षमता के कारण हीन समझ बैठते हैं, कवि उन्हें उनके असली रूप में पहचानता और बताता है कि मनुष्य की शक्ति अपार है, उसे कमतर कभी नहीं समझना चाहिए। कवि उन लोगों के साथ खड़ा है, जिन्हें हम अक्षम मानते हैं। अक्षमता का यह संसार कवि की संवेदना पाकर सक्षम ही नहीं होता अपितु वृहदाकार बन जाता है। एक कविता यदि इस उपेक्षित मानवीय पक्ष को अपेक्षा के रूप में खड़ी करती है तो यह उस कवि के अपने विजन की विशेषता हैइसी तरह मनुष्य की जिजीविषा की बहुत कम शब्दों में बड़ी कविता रघुवंशीजी लिखते हैं जहां से/भय शुरू होता/ वहीं से बुझाते चलो बत्तियां और देखो कि-एक सूरज/तुम्हारे अंदर से/फूट रहा है।' यह कविता भी विरोधी स्थितियों में बढ़ती है। सर्वमान्य सत्य है कि अंधेरे में भय लगता है लेकिन कवि कह रहा है कि जहां से भय की शुरूआत होती है वहां से बत्तियां बुझाना शुरू कर दो। इसका मतलब इससे पहले भय भी था और बत्तियां भी जल रही थीं-रोशनी थी तो भय नहीं होना चाहिएपर था। कवि मनुष्य की ताकत से भली भांति परिचित है, भय और अभावों पर कैसे मानव जीवन ने विजय पाई है कवि उस इतिहास को नहीं बताते बल्कि उस इतिहास से अपने परिचय के नाते यह बताते हैं कि मनुष्य की जिजीविषा ने भय और अंधेरे को अपने अंदर के सूरज से हमेशा पराजित किया है। यह जय और पराजय का खेल नहीं है बल्कि विजयी होने की मानवीय संकल्पना की कविता है जो अपने अंदर से सूरज को पहचानने से उत्पन्न हुई है। हमारे अंदर का सूरज सदियों से रोशनी दिखा रहा है पर इससे वही शक्ति रोशनी पा सकती है, जो इसे देखना जानते हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि कविता शब्दों से छोटी बड़ी नहीं होती, वह होती है अपनी संकल्पनाओं से और मानव जीवन के इतिहास की समझ से। रघुवंशीजी की ये कविताएं भय और अंधेरे के दुःख के पहाड़ की, किसी कोर से उगते हुए सूरज के प्रकाश और लालिमा की कविताएं हैं।


___ कवि की उपस्थिति छोटी कविताओं की अपेक्षा लंबी कविताओं में अधिक होती है। प्रबंधात्मकता कवि के जीवन अनुभव की ही नहीं बल्कि उसकी दृष्टि की भी परख होती है। कवि का अनुभव संसार जितना बड़ा होगा, उसकी लंबी कविता उतने व्यापक फलक पर फैलेगी। इसलिए मैं मानता हूं कि हर कवि को उसकी छोटी कविताओं की अपेक्षा लंबी कविताओं में समझना चाहिए। जिन कवियों के पास लंबी और प्रबंधात्मक कविताएं नहीं होती, उनका दायरा छोटा होता है। छायावाद के चार प्रमुख कवियों में से प्रबंधात्मकता प्रसाद और निराला के पास ही है इसलिए वे बड़े दिखते हैं तो 'कामायनी' और 'रामकी 'शक्तिपूजा' में। छोटी कविताएं एक त्वरा के साथ आती हैं और अपने सघन अनुभवों की तीव्रता से अभिभूत करती हैं लेकिन प्रबंधात्मक कविता लंबे समय तक बांधे रखती है, वह जोड़ती अधिक है छोड़ती कम है। प्रेमशंकर रघुवंशी की तीन लंबी कविताएं इस संग्रह में मौजूद हैं। एक कविता 'तुम्हारी गरूता की बूंघची' जो सितंबर, 1963 की है, जिसे लिखे पचास वर्ष हो गये। इससे कवि के विकास को समझने में मदद मिलती है। तीनों कविताएं जीवन संघर्षों के जटिल अनुभवों पर लिखी गई हैं। यहां संघर्ष अधिक हैं, जाहिर है कि स्वाधीन भारत में जीवन स्थितियां और अधिक जटिल हुई हैं। एक ओर गरीबी लगातार बढ़ रही है तो दूसरी ओर चंद धन्नासेठों के पास अकूत संपत्ति का भंडार बढ़ रहा है। असमानता की खाई निरंतर चौड़ी और मजबूत हो रही हैस्वाधीनता का अर्थ अब केवल मतदान करना भर रह गया है। वैश्वीकरण ने करोड़पति बनने के सपने मध्यवर्गीय आंखों में रोप दिये हैं, जिसने उन्हें चौंधिया दिया है। अमेरिका का ग्रीन कार्ड रात दिन ललचा रहा है और हमारा लालच बढ़ता जा रहा है। प्रेमशंकर रघुवंशी की ये प्रबंधात्मक लंबी कविताएं इस प्रकार के लालच और आपाधापी के विरोध में खड़ी हैं। ये मनुष्य मात्र जीवन संवेदन की कविताएं हैं, जिन्हें पढ़कर अपने समाज की स्थितियों पर दुख भी होता है और जीवन के प्रति विश्वास भी दृढ़ होता है। कविता की ताकत जीवन के प्रति अविश्वास जगाने में नहीं बल्कि जिजीविषा पैदा करने में है रघुवंशीजी इसी अकूत जिजीविषा के कवि हैं।


प्रेमशंकर रघुवंशी की कविताओं को पढ़ते हुए नर्मदा की धारा के आसपास का जीवन और सतपुड़ा के पहाड़ों जैसी ऊँचाई तथा हरियाली ने हमेशा ध्यान खींचा है। उनकी कविता में जिस प्रकार के बहुविध जीवन अनुभव आते हैं, उससे कविता के प्रति विश्वास बढ़ता है और कवि के प्रति अपनापन। यह देखकर और अच्छा लगता है कि उन्हें बड़े कवि होने का कोई भ्रम नहीं है- मैं हमेशा-हमेशा/ छोटा कवि/बना रहना चाहता/ ताकि बनी रहे/बड़ी कविता/रचने की लालसा सदैव/और छोटी कविता/रचते हुए बड़ा कवि होने के/भ्रम नहीं पालूं अंत तक। जिस कवि को भ्रम पालने की आदत नहीं है, वह अपनी रचना से बड़ा बनता है और मानकर चलता है कि जिस प्रकार जीवन अनंत है उसी प्रकार कविता भी अनंत है। कविता जीवन के लिए है तो जीवन को बड़ा मानकर जिया जाये कविता अपने आप बड़ी होती चली जायेगीजो कवि जीवन में छिछलापन जीते हैं उनकी कविता भी छिछलेपन से अलग नहीं हो पाती। रघुवंशी जी इसलिए बड़े कवि नहीं है कि उनके पास नर्मदा नदी और सतपुड़ा पहाड़ है बल्कि इसलिए बड़े कवि हैं कि उन्होंने इनके सलिल पावन जल और शिखरों को अपने मन में धारण किया है।