समकालीन हिन्दी गजल में भाषा का रचनात्मक विकास

आलेख


जहीर कुरेशी


अगर दुष्यंत कुमार को समकालीन हिन्दी गजल का प्रस्थान बिन्दु मान लिया जाए, तो भी हिन्दी गजल की नदी में काफी पानी बह चुका है। हिन्दी गजल को मौजूदा पहचान और सम्मान दिलाने वाले दुष्यंत कुमार के बाद गजल ने साढ़े चार दशक लंबी यात्रा पूरी कर ली है। यद्यपि किसी भी विधा के पल्लवन के लिए पैंतालीस वर्ष का वक्त कोई बहुत बड़ा काल-खण्ड नहीं माना जा सकता।


 अपने कथ्य, वैचारिकता, भाव-भूमि, सामाजिक सरोकार, समकालीनता और राजनैतिक चेतना जैसे तत्वों को आत्म-सात करने के कारण, आज हिन्दी ग़ज़ल पाठकों एवं श्रोताओं की पहली पसंद बनी हुई है। उसका एकमात्र कारण समकालीन हिन्दी गजल का अनंत संभावनाअं होना है। हिन्दी गजल के पास अपनी विराट शब्द संपदा है, मिथक हैं, मुहावरे हैं, बिम्ब हैं, प्रतीक हैं, रदीफ हैं, काफिए हैं। इस प्रकार, समकालीन हिन्दी गजल पारंपरिक गजल की काव्य-रूढ़ियों से मुक्त होने का प्रयास भी है तथा समकालीनता के बरअक्स कथ्य और विषय का उत्तरोत्तर विकास भी हमें इसमें परिलक्षित होता है।


अगर साढ़े चार दशक पहले के काव्य-परिदृश्य को पलट कर देखा जाए तो सत्तर के दशक में, दुष्यंत की गजल की ऐतिहासिक सफलता एवं लोकप्रियता के साथ ही, अनेक विधाओं एवं धाराओं के कवि तेज़ी से हिन्दी गजल की ओर आकृष्ट हुए थे। गीतकार, नवगीतकार, दोहाकार तो हिन्दी गजल में आ ही गए, उर्दू गजल के 69• प्रेरणा समकालीन लेखन के लिए लोकप्रिय शायर भी बाजारवाद के प्रवाह में हिन्दी काव्य-मंचों पर आ कर अपने आप को हिन्दी शैली का ही गजलगो मंचित करने लगे। कुछेक मुक्त-छंद और छन्द-मुक्त कविताओं के कवियों ने भी स्वाद-बदल विधा के रूप में हिन्दी गजल पर हाथ आजमाना शुरू कर दिया। फलस्वरूप हिन्दी गजल में भाषिक बहुरूपता के कारण अनेक भाषाशैलियों ने जन्म लिया। 30 दिसंबर 1975 को समकालीन हिन्दी गजल के पुरोधा कवि दुष्यंत के असामयिक अवसान (मृत्यु) के बाद, अनेक धाराओं के कवि अपनी-अपनी भाषा-शैली को समकालीन हिन्दी गजल की भाषा निरूपित करने में जुट गए।


दुष्यंत के दौर में ही, मुख्य रूप से तीन भाषा-शैलियों के कवियों ने अपनेअपने स्तर पर हिन्दी गजल के पल्लवन में हाथ बंटाया।


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दुष्यंत समेत, पहले प्रकार के कवियों का मूल रुझान भाषा की उर्दू प्रकृति की ओर था। इस प्रकार के हिन्दी कवियों के अवचेतन में कहीं यह बात बैठी हुई थी कि उर्दू की शब्दावली के बिना शेरों में शेरियत नहीं आ सकती। इस शैली के हिन्दी गजलगो मूलतः उर्दू रख-रखाव की ही गजलें कहते रहे । वे अपनी गजलों में केवल उर्दू शब्दों का ही प्रयोग नहीं करते, वरन् उर्दू शब्दावली की इजाफात (विभक्ति कौशल) से भी लाभ उठाने में उन्हें परहेज नहीं रहा। मजेदार बात यह रही कि अपनी सुविधा के लिए ऐसे सभी गजलगों इस भाषा शैली को 'हिन्दोस्तानी' करार देते रहे । देवनागरी में लिखते साथ ही ऐसे लोगों की गजल 'हिन्दी गजल' हो गई ! ___ जहां तक दुष्यंत की भाषा का प्रश्न है, दुष्यंत पर शमशेर की गजलों का गहरा प्रभाव रहा। भोपाल में निवास करने के कारण, ताज भोपाली के अवामी शेरों ने भी दुष्यंत पर खासा असर डाला। इसलिए शायरी का कथ्य बदलते हुए, दुष्यंत ने उस वक्त भाषा को बदलने का जोखिम नहीं उठाया। कहीं-कहीं दुष्यंत ने अपने शेरों में गाढ़ी उर्दू शब्दावली का प्रयोग अवश्य किया लेकिन, उनकी अधिकांश भाषा उर्दू की प्रकृति की ही बनी रही। गाढ़ी उर्दू पदावली वाले शेरों में से यूं तो उनके अनेक शेरों को उद्धृत किया जा सकता है। किन्तु, यहां केवल दो शेरों का उदाहरण ही पर्याप्त है-


कहां तो तय था चरागां हरेक घर के लिए,


कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए!


मसलहत-आमेज होते हैं सियासत के कदम,


तू नहीं समझेगा इनको, तू अभी इन्सान है!


लेकिन, दुष्यंत की गजलों का सुभाव उर्दू प्रकृति की ओर झुका होने के बावजूद, वे उस काल में क्रमिक रूप से हिन्दी प्रकृति की ओर भी देख रहे थे। मसलन-


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,


हो कहीं भी आग, लेकिन, आग जलनी चाहिए।


बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं,


और नदियों के किनारे घर बने हैं।


उस काल-खण्ड में, दुष्यंत की शैली में गजल कहने वालों की संख्या सैकड़ों में नहीं, हज़ारों में हो सकती है। लेकिन, इस आलेख में कुछेक उल्लेखनीय गजलकारों का ही जिक्र संभव है।


दुष्यंत के बाद, दुष्यंत शैली अपनाने वालों में सर्वाधिक सफलता अदम गोंडवी को मिली। वे भी भाषिक रूप से उर्दू प्रकृति में ही शेर निकालते थे और उनके शेरों का केन्द्रीय विषय हाशिए पर खड़ी हिन्दुस्तानी अवाम की पीड़ा ही थीउनका एक लोकप्रिय शेर-


भूख के अहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो,


या अदब को मुफलिसों के अंजुमन तक ले चलो।


अदम गोंडवी चंकि 'एक्टिविस्ट' थे। इसलिए उनके शेरों के कदम रफ्तारफ्ता जनता के हिन्दी मानस की ओर बढ़ रहे थे। यथा


वो जिसके हाथ में छाले हैं, पैरों में बिवाई है,


उसी के दम से रौनक आपके बंगलों में आई है।


दुष्यंत काल में ही सक्रिय, सूर्यभानु गुप्त प्रतीकों एवं उपमाओं के एतबार से अलग ढंग के गजलगो हैं । वे भी उर्दू प्रकृति के ही शेर कहते हैं। लेकिन, अछूते बिम्ब, दृश्यात्मकता, रूपक का गढ़ना उनको अनेक गजलकारों से अलहदा करता है। उनका एक अनूठा शेर-


मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी,


मेरा वजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूं।


लेकिन, सूर्यभानु गुप्त की शायरी का हिन्दी प्रकृति की ओर रूझान जग-जाहिर है। जैसे


उसकी सोचों में मैं उतरता हं,


चांद पर पहले आदमी की तरह।


सौ दफा आदमी को गिराए बिना,


टिकने देती नहीं पीठ पर... जिन्दगी।


ज्ञान प्रकाश विवेक का भी लहजा भाषिक रूप से उर्दू के ही करीब है। उनका एक ऐसा ही शेर मुलाहिजा फरमाइए


जिन्स की तरहा मुझे तौलने वाले, ताज़िर,


तेरी आंखों के तराजू से उतर आया हूं।


उनकी आलोचना पुस्तक 'हिन्दी गजल की विकास यात्रा' में विवेक ने गाढ़ी उर्दू में शेर कहने वाले अनेक गजलकारों (यथा-रमेन्द्र जाखू 'साहिल', डॉ. राजेन्द्र टोंकी, डॉ. चन्द्र त्रिखा आदि) को हिन्दी गजलगो निरूपित कर दिया है, जबकि निस्संदेह वे उर्दू के गजलकार हैं!


जहां तक ज्ञान प्रकाश विवेक का सवाल है, अब उनका भाषिक लहजा हिन्दी की ओर पदार्पण कर रहा है। यथा-


अपनी आंखें जब महाजन को चुका दी ब्याज में,


रोशनी का तब हमें भावार्थ समझाया गया।


नूर मोहम्मद नूर का भी प्रारंभिक लबो-लहजा इजाफ़ात और गाढ़े उर्दू के शब्दों को ही ले कर आगे बढ़ता है। जैसे :


सारे मकतूल भी, कातिल भी हैं अपने घर के,


अपने घर-बार को मकतल न बनाओ, यारो!


लेकिन, अब उनके शेर भी हिन्दी की उस शब्दावली की ओर उन्मुख हुए हैं, जिनका हिन्दी रूझान सुस्पष्ट है। जैसे :


कुछ उसके रूप का जादू, कुछ उसके रंग का मंतर,


मैं चढ़ जाता हूं अब भी दौड़ करके सीढ़ियां सौ-सौ।


राजेश रेड्डी भी उर्दू रख-रखाव की ही गजलें कहते हैं। उनके शेरों में इजाफात भी मिलती हैं और ईमां, इन्सां, आस्मां जैसे शब्द भी। उनका इसी लहजे का एक लोकप्रिय शेर-


ईमां की तिजारत के लिए इन दिनों हम भी,


बाजार में अच्छी-सी जगह ढूंढ़ रहे हैं।


किन्तु राजेश रेड्डी के यहां कुछेक ऐसे शेर भी मिलते हैं, जिनका हिन्दी रुझान असंदिग्ध है। उनका एक बहुत मशहूर शेर-


मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा बच्चा,


बड़ों की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है।


सुलतान अहमद भी ग़ज़ल की उर्दू प्रकृति को पोसने वाले पुराने ग़ज़लकार हैं। प्रायः उनके शेरों में उनकी उर्दू प्रकृति झलकती रहती है। उनका एक शेर


लड़खड़ाया तो बुलंदी पे बहुत मैं, लेकिन,


मुझको नासेह की नसीहत ने उतरने न दिया


इधर कुछ दिनों से, उनके शेरों में हिन्दी लहजा देख कर मुझे खुशी हो रही है। उनका एक विरल शेर


ये चन्द ख्वाब निगाहों में जो हमारे हैं,


कठिन बहुत हैं, मगर, जान से भी प्यारे हैं


वैश्विक बाजारवाद ने उर्दू के अनेकानेक उपभोक्तावादी ग़ज़लकारों को समझा दिया है कि देवनागरी में पुस्तक प्रकाशन और हिन्दी काव्य-मंचों को साझा करने उनको लाभ ही लाभ है। स्वर्गीय शहरयार, डॉ. अख्तर नज्मी से ले कर डॉ. बशीर बद्र, निदा फाज्ली, डॉ. वसीम वरेलवी, मुनव्वर राना, डॉ. राहत इन्दौरी आदि शायरों तक, हिन्दी के ऐसे ग़ज़लकारों की शैली से खूब इत्तेफाक रखते हैं। प्रायः उनकी गजलें इन हिन्दी गजलकारों से भी सरल और प्रभावशाली होती हैं। लेकिन, गंगोजमुनी कवि-सम्मेलनों में अपना कलाम पढ़ कर और कुछेक हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से छप कर भी उन्हें अपने उर्दू गजलगो होने पर गर्व है !


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दुष्यंत के काल-खण्ड में ही, आज से साढ़े चार दशक पहले, शुद्ध हिन्दी गजलकारों ने गजल विधा के चरित्र और मिजाज की अवहेलना करते हुए, भाषिक दृष्टि से नीरस और कानों को चुभने वाली शुद्ध हिन्दी गजल की रचनात्मकता पर ज़ोर दिया। इसके पीछे संभवतः उनके मन में हिन्दी गजल के नायक बन जाने का विरल स्वप्न रहा होगा। इन गजलकारों ने जन-सामान्य में प्रचलित 'सियासतजुबान, मजा, रौनक, इंकिलाब, परचम, दरख्त, पैगाम' जैसे शब्दों का भी हिन्दीकरण कर डालाइस 'कुल' के गजलगो प्रायः अरेबिक बहरों को नहीं मानते। ये गजल की बहरों में हिन्दी छन्दों को ढूंढते रहते हैं। उनके अनुसार, ग़जल (दोहे की तरह) मात्रिक छंद है। संरचना की इसी दुविधा से बचने के लिए कोई शुद्ध हिन्दी गजलकार गजल को 'गीतिका' कहता है तो कोई 'मुक्तिका'।


शुद्ध हिन्दी गजल के प्रणेताओं में सबसे मुखर नाम है चन्द्रसेन विराट का। विराट जी अपने आप को दष्यंत से भी पर्व का गजलगो मानते हैं। निशानदेही के लिए चन्द्रसेन विराट का एक शेर मुलाहिजा फरमायें-


मुक्तिका हो सांस्कृतिक, सम्प्रेषण-युक्त रसमयी,


शब्द, ध्वनि, लय, छन्द, स्वर भी दो विषय के देवता।


लेकिन, धीरे-धीरे चन्द्रसेन विराट भी अपनी गजल की भाषा को छोर से मध्य विन्दु की ओर लाने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनका एक ताजा शेर


ठंडा मत हो जाने देना,


अपना रक्त तपाते रहना।


शद्ध हिन्दी गजल के प्रणेताओं में, एक नाम डॉ. शिव ओम अम्बर का भी है। भाषिक दृष्टि से उनके शेर भी शुद्धतावादी होते हैं। डॉ. अम्बर का ऐसा ही एक शेर-


उपनिषद् के स्वस्ति मंत्रों को नहीं दोहराइए,


वक़्त ये वृत्तासुरी है, वज्र में ढ़ल जाइए!


विगत 4-5 वर्षों में डॉ. शिव ओम अम्बर की भाषा में भी गुणात्मक परिवर्तन आ रहा है। उनका एक मध्य-मार्गी शेर-


इन चिरागों से आस मत बांधो,


इन चिरागों की जोत मद्धम है।


प्रारंभिक तौर पर एहतराम इस्लाम ने भी शुद्धतावादी हिन्दी गजलें कह कर अपनी विरल छवि बनानी चाही। उनका एक इसी शैली का शेर


दृष्टि में शासन की सर्वोपरि है कुछ तो लोक सेवा


लोक सेवा के लिए अफसर बढ़ाए जा रहे हैं।


धीरे-धीरे भाषा के इस छोर से एहतराम इस्लाम भी मध्य विन्दु की ओर लौट रहे हैं। उनका एक ताजा शेर


तुम्हारे जुल्म की छाया में और चमकेगा,


किसी भी हाल में जो खुद को मस्त रखता है।


शुद्ध हिन्दी गजल के एक सुपरिचित गजलगो का मैं और जिक्र करना चाहता हूं। उनका नाम है डॉ. अनन्त राम मिश्र 'अनन्त'। वे भी अपनी शुद्धतावादी हिन्दी गजलों के लिए चर्चित हैं। निशानदेही के लिए उनका एक शेर


आज क्यों लगती मुमूर्ष जिजीविषा भी,


अहमहमिका वृत्ति जागृत हो उठी है।


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यह मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि आरंभिक तौर पर नयी विधाओं के साथ हमेशा संशय बने रहते हैं। हिन्दी गजल के साथ भी रहे। लेकिन, साढ़े चार दशक की इस कालावधि में भाषाई स्तर पर मध्यमार्गी हिन्दी गजलकारों ने गजल के चरित्र और मिजाज को समझा। अनेक आत्म-संघर्षों एवं विमर्शों से गुजरने के बाद, हिन्दी में गजल कहने वाले अधिकांश गजलकारों ने भाषाई स्तर पर एक बीच का रास्ता चुना आज मध्यमार्गी हिन्दी गजलकार ही हिन्दी गजल की काव्य-परम्परा को आगे बढ़ाने वाले गतिमान गजलगो माने जा सकते हैं।


मध्य-मार्गी हिन्दी गजलकारों में जहीर कुरेशी एक महत्त्वपूर्ण नाम है-जो साढ़े चार दशक से अविराम मध्य-मार्गी शेर कह रहे हैं। निशानदेही के लिए उनके दो शेर-


ऐसा भी स्वप्न देखने वाला मिला मुझे,


साकार हो न पाया तो सपना बदल दिया।


'समुद्र' शक्ल से कितना शरीफ लगता है,


ये तस्करों से मिला है, पता नहीं लगता!


राम कुमार कृषक भी लंबे अर्से से मध्य-मार्गी गजलें कह रहे हैं। लोक में प्रचलित मुहावरे कई बार उनके शेरों को अतिरिक्त चमक प्रदान करते हैं। यथा


जिन्दगी से जुड़ गए होते तो कुछ तो सीखते,


कायदा बाकायदा पढ़ कर निरक्षर हो गए।


भाषिक रूप से डॉ. विनय मिश्र भी मध्य-मार्ग के प्रवक्ता गजलकार हैं। वे हिन्दी गजलों में इजाफात (विभक्ति कौशल) का विरोध करते हैं। उनके दो शेर


उस घर की कितनी यादें जुड़ी हैं, मैं क्या कहूं,


जिस घर में लौट कर मैं दुबारा नहीं गया


संशय की हर कदम पर खुलती हुई गली है,


दुविधा में पल रही ये इक्कीसवीं सदी है।


हरे राम समीप ने भी हिन्दी गजल में एक लंबा रास्ता तय किया है। चुनौती स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता उनका एक चुस्त मध्य-मार्गी शेर


कब तलक डरते रहोगे- ये न हो, फिर वो न हो,


जो भी होना है, उसे इस बार हो जाने तो दो!


तीन दशक से डॉ. अनिल गौड़ भी चुपचाप हिन्दी प्रकृति की गजलें कह रहे हैं। उनका एक उम्दा शेर


वक्त मरहम कभी नहीं होता,


काम, बस, अन्तराल करते हैं।


बल्ली सिंह चीमा अदम गोंडवी की तरह ‘एक्टीविस्ट' गजलकार हैं- जिनके शेरों का रुझान मध्य-मार्गी है। उनका एक आगाह करता हआ शेर


बहुत चालाक है दुश्मन, उजालों को खबर कर दो,


दिये के ठीक नीचे ही अंधेरा बैठ जाता है!


हिन्दी सुभाव के होने के बावजूद माधव कौशिक के शेरों का लहजा कुछ अलग ढंग का होता हैउनके दो शेर


मेरी बस्ती के सभी लोगों को जाने क्या हुआ,


देखते रहते हैं सारे, बोलता कोई नहीं।


'सत्यमेव जयते' सब कहते हैं, लेकिन,


सच्चाई की मात समझ से बाहर है।


हिन्दी गजल की दुनिया में डॉ. कुमार विनोद को आए दो दशक से अधिक नहीं हुए, लेकिन, उनके मध्य बिन्दु की ओर उन्मुख शेर आकर्षित करते हैं। जैसे


खूबसूरत जिस्म हो या सौ टका ईमान हो


बेचने की ठान लो तो हर तरफ बाजार है।


देवेन्द्र आर्य मध्य-मार्गी हिन्दी गजल के महत्वपूर्ण गजलकार हैं। जिनके शेरों की समकालीनता भी बरबस पाठक का ध्यान अपनी ओर खींचती है। उनके दो शेर


कुछ खास ही चेहरों पे बरसती रही रौनक,


इस देश के मनहूस का चेहरा नहीं बदला!


नयी पालिश हुई है आंकड़ों पर,


चलो, इक बार फिर जोड़ें-घटायें।


अनिरुद्ध सिन्हा के शेरों का मिजाज भी मध्य-मार्गी है। शिनाख्त के लिए उनका एक उम्दा शेर


पल-दो पल के जीवन में भी लोग... यहां,


अपनी-अपनी चादर ले कर मिलते हैं।


कवयित्रियों में इन्दु श्रीवास्तव ही गजल के हिन्दी मिजाज की नुमाइन्दगी करती हैं। उनका एक लोकप्रिय शेर


योग्यता रास्ते में भटकती रही,


चौखटों में जड़ी डिग्रियां रह गईं।


डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल की गजल साधना भी साढ़े चार दशक से कम नहीं। उनकी गजलों का झुकाव भी मध्य-मार्ग की ओर है। उनका ऐसा ही एक शेर-


हो न हो, उसको भी है सूरज का जैसे इंतिजार,


जागता रहता है क्यों ये सुबह का तारा, समझ!


भाषिक रूप से मध्य-मार्ग की ओर उन्मुख महेश अग्रवाल मुख्य रूप से व्यवस्था-विरोध के शायर हैं। उनका एक उम्दा शेर


कहकहों से कोठियां गूंजें भले, लेकिन,


झोंपड़ी का मुस्कुराना भी जरूरी है।


लगभग तीन दशक से रचनारत मध्य-मार्गी गजलगो अशोक रावत का ध्यानाकर्षण करता हुआ एक शेर-


जो समंदर मछलियों पर जान देता था कभी


वो समंदर हो गया है अब मछेरों की तरफ।


कुल मिला कर, हिन्दी गजल में साढ़े चार दशक के आत्म-मंथन के बादभाषिक रूप से स्वतः ही मध्य-मार्ग स्वीकार्य हो गया है। गजल के चरित्र और मिजाज को समझते हुए मध्यमार्गी हिन्दी गजलकार तो हिन्दी सुझाव की गजलें कह ही रहे हैं. उर्द प्रकति के गजलगो और शद्ध हिन्दी गजलकारों के पांव भी शनैः शनैः मध्य-मार्ग की ओर चल पड़े हैं। यह हिन्दी गजल के रचनात्मक विकास के लिए शुभ-संकेत है। भाषा की एकरूपता से बेचेहरा हिन्दी गजल को एक चेहरा मिलेगाइस प्रकार, हिन्दी गजल की एक मानक भाषा का पथ भी प्रशस्त होगा।


फिर भी, जिज्ञासु पाठक पूछ सकते हैं कि आपकी मध्य-मार्गी हिन्दी गजल को हम किन विशेषताओं से पहचानें? तो स्थूल रूप से मध्य-मार्गी हिन्दी गजलकारों की निम्नांकित निशानदेही होगी :


(1) ये शेर कहते हुए उर्दू की (अरेबिक) बहरों को मानते हैं


(2) ये उर्दू शायरी में प्रचलित इजाफात यानी विभक्ति-कौशल (यथागर्दिशे-दौरां, गुले-नग्मा, शबे-फिराक आदि) को अपने शेरों में जगह नहीं देते।


(3) ये उर्दू के जन-सामान्य में प्रचलित शब्दों से परहेज नहीं करते। लेकिनउर्दू के ऐसे शब्दों से परहेज करते हैं, जिन्हें समझने के लिए शब्दकोष खोलना पड़ेजिनका सामान्य-जन उपयोग नहीं करते


(4) ये अपने शेरों में प्रचलित हिन्दी शब्दों और लोक में प्रचलित मुहावरों को स्थान देते हैं।


(5) 'तगज्जुल' को मानते हैं। लेकिन, 'तगज्जुल' को केवल उक्तिवैचित्र्य तक सीमित रखना नहीं चाहते । युगानुरूप ये हिन्दी गजलगो तगज्जुल' का विस्तार भी करना चाहते हैं।


हिन्दी गजल की भाषिक रूपरेखा ऐसी बिल्कुल नहीं है कि उसको हल ही किया जा सके। विधा-विशेष के भावी उन्नयन के लिए हमें अपने व्यक्तिगत आग्रहों-दुराग्रहों.... लाभ-हानियों को छोड़ना होगा। हिन्दी गजल का मानक स्वरूप तभी निर्धारित होगा, जब गजलकारों के मन में भाषा संबंधी कोई आग्रह.... कोई द्वैत न रहे। 'अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग' अलापने से समकालीन हिन्दी गजल की भाषा के संबंध में लोग एकमत नहीं हो सकते। इसी खींच-तान से, विधा फिर दस साल पीछे चली जाती है। स्वतः ही जिसका लाभ, उस कविता-शिविर के आलोचकों को मिलता है-जो हिन्दी गजल को मुख्य-धारा की कविता के रूप में देखना पसंद नहीं करते!