हिन्दी में गजल को आलोचना-दृष्टि विकसित करने की जरूरत

आलेख


महेश अश्क


(प्रस्तुत आलेख हिन्दी में गजल के समुचित और सुव्यवस्थित विकास के लिए आलोचना-दृष्टि के विकास पर बल देता है और इस क्रम में-आंतरिक तौर पर, जिन कुछ बातों को समाहित करते हुए उसे आगे बढ़ना हो सकता है,- उनकी तरफ संकेत करता है। आलेख रचनामुखी-आलोचनाका पक्ष लेता है। ऐसी आलोचना-शेर या कविता को अपने विवेचन-विश्लेषण का विषय बनाते हुए, -उसमें प्रयुक्त हर शब्द का संज्ञान लेती, उससे संवाद करती और कथन-प्रयोजन में उसकी भूमिका को टोहती-परखती हुई, तार्किक तौरपर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश करती है। हमें पता है कि आलोचना-दृष्टि का विकास, एक सतत और सुनिश्चित प्रक्रिया में आगे बढ़ते जाना है, इसलिये धैर्यपूर्वक अनुशीलन और सतर्क विश्लेषण-विवेचन उसका सहज स्वभाव-सा है। आलेख में जो संकेत इस बाबत किये गये हैं, उन्हें गजल के माध्यम से आने वाली कविता, उसके काव्य-स्वभाव, भाषा के साथ उसके आंतरिक संबंधों-अंतर्सबंधों तथा कविता को अर्थवान बनाने वाले कारकों आदि से प्राप्त करने का प्रयास किया गया है। फिर भी, कुछ छूट गया हो, इस आशंका-संभावना से इनकार नहीं है। कुल मिलाकर यह आलेख-आलोचना दृष्टि के विकास की दिशा में, एक हल्की सी निशानदेही या साधारण-सी पहल है, जोऐसे व्यक्ति द्वारा की गयी है जो आलोचक नहीं है इसलिये उन संकेतों से मामला करने में, अपनी सूझ-बूझ से काम लेते हुए, आगे बढ़ना ही मुनासिब होगा। म.अ.)।


हिन्दी में, गजल-लेखन का मौजूदा सिलसिला अब अपनी पांचवीं दहाई में है। इस दौरान, इस विधा ने यहां जो भी अच्छा किया है, उसे जानना-समझना और उसके जीवंत पहलुओं का संज्ञान लेते हुए वस्तुगत-नतीजे तक पहुंचना एवं सहजतापूर्वक अपने बीच, उसे बयान करना, इस विधा की समृद्धि और सकारात्मकविकास के लिए, हमारी सामूहिक जरूरत है, और जिम्मेदारी भी। यह कार्य जिस किसी ढंग से किया जायेगा, वह कोई न कोई आलोचकीय तौर-तरीका ही हो सकता है, जिसके लिये सुव्यवस्थित और सुनिर्धारित आलोचना-दृष्टि आवश्यक है, जो एक निरंतर-प्रक्रिया के तहत विकसित होती है और जिसमें छान-फटक, ग्रहण और आत्मसात का क्रम लगातार चलता रहता है। आलोचना और काव्यदृष्टि,-सहयोगी और उपयोगी उन अन्तर्दृष्टियों के सानिध्य में समृद्ध होती और आगे बढ़ती हैं, जो चाहे अपनी भाषा और साहित्य की न हों, लेकिन, उनसे लाभान्वित होना-हमारी भाषा और साहित्य को मालामाल करने वाला और उसमें पच जानेवाला हो।


हिन्दी में मौजूदा सिलसिले के अलावा,-गजल लेखन की कोई व्यवस्थित और सुदीर्घ-परम्परा चूंकि नहीं रही है, इसलिये उसके माध्यम से आनेवाली कविता के भरपूर आस्वादन का भी कोई सुस्पष्ट और सुनिश्चित आलोचकीय तौर-तरीका ऐसा नहीं बन सका, जो इस विधा की कविताके साथ पूरा-पूरा न्याय कर सकेपरिणामतः इस काम को अपेक्षित परिणाम तक ठीक-ठीक पहुंचाने के लिये, जरूरी है कि गजल के रचनाकारों में से ही कुछ लोग आगे आयें। स्वभावतः भी ऐसा है कि रचनाकार, कम से कम अपनी रचना-विधा की सीमा तक, थोड़ा-बहुत आलोचकीयएहसास रखता है। जरूरत है इसी एहसास को थोड़ा और तार्किक और वस्तुगत बनाते हुए, कार्यारंभ के लिये प्रस्तुत होने की, फिर जब एक दिशा मिल गयी तो आगे का विकास खुद-ब-खुद अपनी राह तलाश लेगाबुजुर्ग कह ही गये हैं कि काम ही काम को सिखाता है।


गजल की आलोचना-दृष्टि के विकास की तैयारी दो सतहों को एक साथ साधने की है। पहली सतह विधागत-अनुशासन के निर्वाह का जायजा लेती और निर्णय करती है कि-गजल अपने विधागत स्वरूप में पूरी तरह आ पायी है अथवा नहींदूसरी सतह के तहत कथ्य-निर्वाह, भाषा के इस्तेमाल आदि से होते हए के सौंदर्य-सौष्ठव या संवर्द्धन की स्थिति की पड़ताल की जाती है। पहली सतह पर विवेचन में, उर्दू में इस हद तक सख्ती है, कि अगर किसी स्तर पर हल्की सी भी कोई चूक मिल जाय, तो उस कोशिश को वहीं टाट बाहर कर दिया जाता हैऔर उसे आगे की विचारणा के योग्य समझा ही नहीं जाता। हिन्दी में ऐसी किसी स्थिति में रवैया क्या होगा, यह तय करने की बात है। क्योंकि उर्दू में उक्त तरह की सख्ती को ही सब कुछ मान लिया गया हो, ऐसा भी नहीं है। एक बार ऐसे ही किसी संदर्भ से-संभवतः रशीद अहमद खां साहेब ने इस तरह के व्यवहार की लगभग खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि छंदशास्त्र की दृष्टि से त्रुटिहीन शेर की खूबी यह है कि उसमें इस लेहाज से कोई खामी नहीं रह जाती, लेकिन, उसकी खराबी यह है कि, उसमें शेर के बाकी कोई और गुण होते ही नहीं हैं। इस कथन से स्पष्ट होता है कि गजल के शेर का, शास्त्रीय-दृष्टि से नख-शिख दुरूस्त होना ही, सब कुछ नहीं होता -क्योंकि शेर का पूरा सौंदर्य यही नहीं है, यानी शेर को, शेर रूप में खड़े होने के बाद उसे हमसे कुछ बोलना-बतियाना भी चाहिए, और यह बोलना-बतियाना ऐसा होना चाहिए जो हमारी जानकारी में, किसी भी स्तर पर, कुछ ताजा-तरीन जोड़े, अर्थात् शेर को उसे पढ़ते या सुनते हुए-हमें महसूस हो, कि हमारी सुरुचि कुछ ताजा और समृद्ध भी हो रही है, हमें कुछ मिल रहा है। कविता का या शेर का, गुण यह है कि वह अपने सुनने-पढ़ने वाले पर लदता नहीं है, साथ-साथ चलता है, और चलने की इस गति को थोड़ा बढ़ा देता है।


हिन्दी गजल की आलोचना के, ऊपर उल्लिखित दोनों सतहों पर दक्ष होने के साथ ही हिन्दी की काव्य-परम्परा से भी गहरे अर्थों में संस्कारित तथा रचनाधर्मी या रचना-मुखी होना चाहिए। ऐसा गजल के, हिन्दी काव्य-परम्परा की विधा के रूप में स्वीकृति के लिये जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक, हिन्दी गजल के काव्य-व्यक्तित्व के विकास के लिये उपयोगी है। हिन्दी की गजल के,-उर्दू की गजल से लेन-देन के मामले को सहज और समावेशी ढंग से न लेकर, कुछ लोग इसे मुद्दा बना कर पेश करते हैं। कुछ का मानना है कि हिन्दी की गजल को उर्दू से कोई लेना-देना नहीं रखना चाहिए और उसे स्वतंत्र रूप से अपने व्यक्तित्व का विकास, अपने बूते करना चाहिए। ये लोग अपनी बात का कोई तार्किक-आधार प्रस्तुत नहीं करते, न ही यह बताते हैं कि किसी भी व्यक्तित्व के स्वतंत्र-विकास से उनका अभिप्राय क्या कहने का है? इसी से मिलता-जुलता काम यह भी है कि कुछ लोग हिन्दी की गजल को दो हिस्सों में बांटकर यह बताते हैं कि अमुक किस्म की गजल हिन्दी की है, और अमुक किस्मवाली ठेठ उर्दू की, जिसे देवनागरी लिपि में सिर्फ लिख दिया गया है। यह लोग इतने भोले हैं कि यह भी नहीं समझते कि इस तरह का विभाजन अगर कहीं जरूरी हआ भी तो फैसला प्रवत्तिगत आधार पर ही संभव हैकुछ और लोग हैं जिनका मानना है कि हिन्दी गजल को अपने-आप को समृद्ध करने के लिये उर्दू गजल से जो कुछ भी सीखना संभव हो, सीखना चाहिए। इन लोगों की बात पर निगाह ठहरती है। आखिर गजल की विधा तो उर्दू से ही हिन्दी में आयी, तब यह सवाल किसी ने क्यों नहीं उठाया कि उर्दू से हमारा कोई लेना-देना नहीं, होना चाहिए? दूसरी बात यह कि जब विधा हमने उर्दू से ली, और उसे अपना ही ली है, तो अब अगर हम यह भी उर्दू से देखना और सीखना चाहें कि वहां एक अच्छे शेर का आधार किन-किन बातों को बनाया जाता है, कथ्य-निर्वाह की किस स्थिति को उत्तम कहा जाता है, भाषा के इस्तेमाल की बारीकियां क्या हैं, वहां बयान अर्थवान किस तरह बनता है और अंदाजे-बयान आदि का शेर में मतलब क्या है, तो इससे समृद्ध तो अंततः हमारा ही लेखन होगा? -फिर इसमें हर्ज क्या है? बचना, सिर्फ किसी की भी फोटोकापी बनने से चाहिए। इस मामले में महत्वपूर्ण यह है कि हिन्दी और उर्दू दोनों ही इसी महाद्वीप, इसी धरती की दो आदरणीय और दिल से करीबतर भाषाएं हैं, दोनों में व्याकरण और भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से, देश की अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक समानताएं हैं, इसलिये दोनों के बीच लिपि का अंतर भी बहुत तीखा अंतर नहीं है। गजल की बात करें, तो इस विधाके प्रायः हर पहलू पर गहन-विचारणा का उर्दू में सदियों पुराना इतिहास है जिसमें उसके हर-हर पहलू पर मंथन का लम्बा-लम्बा दौर चला है जिससे निकल कर वहां जो भी दृष्टि या अंतर्दृष्टि विकसित हुई है, उसका व्यवहारिक और तार्किक आधार है, जिसे जोम में आकर और आशिकी-माशूकी की शायरी बता कर रद या प्रभावहीन नहीं किया जा सकता। इन दृष्टियों-अन्तर्दृष्टियों की जड़ें जीवन-जगत के प्रति दृष्टिकोण, वस्तु-जगत की अवधारणा, समय सापेक्षता, जीवन पर पड़ रहे दबावों आदि के खिलाफ आंतरिकप्रतिरोध, सरोकार और इन्सान की अहमियत आदि में गहरे तक धंसी हुई है, और अपने-आप में एक समृद्ध-संसार रचती हैं। गजल वहां सदियों से प्रमुख काव्यविधा आखिर यूं ही तो नहीं बनी हुई है? इसलिये हिन्दी गजल के उपरोक्त टाइप के विद्वान अगर हिन्दी में गजल को लेकर वाकई कुछ अच्छा और समृद्ध करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपनी सोच को उन्हें जमीन पर लाने की कोशिश करनी चाहिएशिगूफेबाजी बड़ी आसान चीज है, लेकिन इससे अब तक न तो किसी का कोई भला हुआ है, और न, ही आगे इस तरह की कोई उम्मीद बनती है। अब रहीतमामतर समानताओं के बावजूद हिन्दी और उर्दू के दो अलग-अलग भाषा होने की बात,-तो इसके कारण और कारक संकुचित न होकर बेहद आंतरिक और मूल्यवान हैं, क्योंकि यही कारण और यही कारक, इन दोनों भाषाओं को अलग-अलग भाषिक-व्यक्तित्व और पहचान प्रदान करते हैं। खैर हिन्दी गजल के लेन-देन को इतनी दूर तक जाना भी नहीं है, उसका काम तो दोनों भाषाओं की जो समान-भूमि है, उसी पर निमट जाने वाला है।


अब तक जिन बातों से हम गुजरे हैं, उसके आलोक में हिन्दी गजल के मौजूदा सिलसिले पर अगर नजर डालें तो कह सकते हैं कि पिछले ढाई-तीन दशक खासे महत्व के हैं। इस अवधि में इस विधा ने यहां, अपना एक व्यक्तित्व विकसित किया है, पहचान में आने वाली आवाज अर्जित की है, जीवनानुभवों में अपनी बू-बास का आस्वाद भरा है,-वस्तु-जगत और जीवन के बीच संबंधों-अतसंबंधों की नयी अर्थवत्ता तलाश की है और समय की बे-चेहरगी को अपनी आखों पहचानने और उससे सार्थक-संवाद स्थापित करने की लगातार कोशिश की है। हिन्दी गजल ने इस दौरान अपने आस-पास, घर-आंगन, आदमी पर पड़ रहे बाहरी भीतरी दबावों और इन सबके बीच जीने की उसकी ललक-ऊर्जस्विता की जैसी विविधतापूर्ण और विश्वसनीय तस्वीर पेश की है, वैसी पूर्व की अधिकतर हिन्दी गजलों में प्रायः दुर्लभ है। हालांकि इन और इन जैसी अन्य अनेक खूबियों को हिन्दी गजल में आगे और निखर कर, कुछ और सघन होकर अभी आना है, लेकिन इस बीच उभरे नामों की कोशिशों से फिलहाल आगे के लिये अच्छी उम्मीद तो बंधती ही है। इन नामों में कुछ तो ऐसे हैं जिनकी कोशिशों में चमक के अपने आंतरिक-स्रोत हैं। प्रेमकिरण जी एक बार कह रहे थे कि इस बीच हिन्दी गजल में जो नया खून आया है, वह अपनी कोशिशों को बेहतर करने और उसे अधिक से अधिक कारगर बनाने को लेकर काफी संजीदगी से सक्रिय है, बल्कि इस विधा की बारीकियों को नजदीक से समझने और उन्हें अपने रचनात्मक-स्वभाव का हिस्सा बनाने की गरज से कई नये लोगों ने तो बाकायद-उर्दू पढ़ना भी शुरू कर दिया है और इस दिशा में कुछ अर्थवान कर गुजरने के लिये काफी उत्सुक नजर आते हैं। किरण जी की यह सूचना हिन्दी गजल के लिये वाकई एक शुभ संकेत है, जिसका हमें दिल से स्वागत करना चाहिए। यहां अगर हिन्दी गजल के मौजूदा सिलसिले से कुछ शेर भी देख लिये जायं, तो ऊपर इसके संदर्भ से जो बातें कहीं गयी हैं, वह कुछ और भी स्पष्ट हो जाती हैं।


1. अपनों से बच-बच कर निकलें, यारों से घबरायें हम?


इतने तो दिन बुरे नहीं हैं, मिलने से कतरायें हम?? -प्रेम किरण


2. ये एक रीढ़ हमें रोकती है झुकने से


ये एक झुकता हुआ सिर उदास करता है। -नवनीत शर्मा


3. अपनी आजादी, आधी-रात का वक्त


इक मुअम्मा था, इक पहेली थी। -सरवत जमाल


4. एक दिन पूछेगी नदिया से कि क्यों साथ तेरे


अब मेरे गांव की मिट्टी नहीं आया करती। -अनु जसरोटिया


5. क्या मेरी, इतनी-सी भी औकात नहीं?


मेरे मन-माफिक कोई सौगात नहीं?? -मुक्ता


6. मेरी थी भूल, मैं ही सुन न पायी


खुला एलान थीं खामोशियां भी। -मृदुला अरुण


 7. वक्त के इस शार्पनर में जिंदगी छिलती रही


मैं बनाता ही रहा, इस पेंसिल को नोकदार। -हरेराम समीप


 8. तुम हो तो ये घर लगता है


वर्ना इसमें, डर लगता है।-विज्ञान व्रत


9. आयी चिड़िया तो मैंने ये जाना


मेरे कमरे में आस्मान भी है।-हरजीत सिंह (स्व.) 


10. सुखायेंगे कहां दुख-दर्द अपने


कहीं तो अलगनी रखनी पड़ेगी? - सत्य प्रकाश शर्मा


11. हर तरफ जाले थे, बिल थी, घोसले छप्पर में थे


जाने कितने घर, मेरे उस एक कच्चे घर में थे।-राम प्रकाश बेखुद्र


12. बेबसी अपनी कभी यूं भी जला देती हं मैं


और भी घर को, करीने से सजा देती हूँ मैं। -मीनाक्षी 


13. इसके पहले, कि खेल रूक जाये


वो खिलौनों में चाबियां देगा। -सलीम अख्तर 


14. यहां अब भूख को लेकर बहस बेकार है शायद


तरक्की का तो पैमाना शेयर बाजार है शायद। -किशोर तिवारी केशू 


15. यार, सुना है अम्बर ने सिर फोड़ लिया दीवारों से


आखिर तुमने क्या कह डाला सूरज, चांद सितारों से। -आलोक श्रीवास्तव


16. लोग अर्थी को कांधा लगाते हुए


कैमरा देख कर मुस्कुराते हुए। -नवीन शुक्ल नवीन


17. कहां तक डरोगे, कहां तक बचोगे? 


ये दुनिया है, दुनिया खबर ढूंढती हैं। -अशोक अंजुम


18. हरापन में अटक जाये कि अपनी राह ले कोई


नजारा करता तो रहता है जंगल, कुछ नहीं कहता। -अखिलेश तिवारी


19. सबकी जिद है कि मेरा हिस्सा दो


घर बना कर मैं इम्तहान में हूं-सै. आसिम रऊफ


20. चाहे अब के बार लह से ज्यादा महंगा पानी है 


हमने भी जिंदा रहने की हर हालत में ठानी है। -माधव कौशिक


21. बिछड़ने की कई व्याकुल कथाएं


मुहब्बत की कहानी है जरा-सी। -ज्ञान प्रकाश 'विवेक'


22. पत्थर पहले खुद को पत्थर करता है


उसके बाद ही कुछ कारीगर करता है। -मदन मोहन दानिश


23. इबादत-खाने ढाये जा रहे हैं


सिनेमा-घर बनाये जा रहे हैं। -वी.आर. विप्लवी 


24. सबको मालूम है, इक खबर दब गयी


इश्तिहारों-भरा आज अखबार है। -नीरज गोस्वामी


25. सारी भेड़ें ऊन दे कर आ गयी हैं


सोच में डूबा हुआ इक मेमना है। -वीरेन्द्र ‘हमदम' 


 26. मैं बड़ी देकर तक रहा मसरूफ


वो बहुत दूर तक दिखी मुझको-नूर मोहम्मद 'नूर'


27. पूछती हैं मछलियों से मछलियां


ये नदी हमको कहां ले जायेगी। -सुरेन्द्र शास्त्री 


28. बला की चौकसी चारों तरफ है


बताना, कल कोई त्योहार है क्या। -आर.डी.एन.श्रीवास्तव 


29. जहां भी हो, वो बिल्कुल ठीक होगा


मगर मैं क्या करूं बेचैनियों का। -भावना 


 30. कामयाबी गुलाम थी जिसकी


कल मिला वो भी चश्मे-तर तनहा। -उषा यादव 'उषा'


31. मौसम की तरह लोग बदलते ही रहेंगे


बदले हुए मौसम का जरा लुत्फ लिया कर। -डॉ. गणेश गायकवाड़


32. शब्द के अर्थ ही बदल डाले


वर्ना, मुझको सिफर नहीं मिलता। -किशन तिवारी


33. जानते थे कि इक छलावा है


ख्वाब देखे हैं रात भर फिर भी। -सुभाष पाठक जिया


34. इमारत बोलती है रोशनी की


अंधेरों की मगर तस्वीर लेकर। -यश मालवीय


35. ये द्रोण उनसे अंगठा तो मांग लेते हैं


ये एकलव्यों को शिक्षा कभी नहीं देते। -द्विजेन्द्र द्विज


36. सुना, देखा, पढ़ा जो कुछ भी यारब क्यों नहीं होता


हमारी आह का प्याला लबा-लब क्यों नहीं होता। -शिवशंकर मिश्र


37. हौसला थोड़ा है, हुशियारी बहुत है


आदमी में अब ये बीमारी बहुत है। -राजेन्द्र तिवारी


38. हमारे ही कदम छोटे थे वर्ना


यहां, परबत कोई ऊंचा नहीं था। -हस्तीमल हस्ती


39. अपने ही घर में अजनबी की तरह 


मैं सुराही में इक नदी की तरह। -सूर्यभानु गुप्त


40. हरेक मन में समंदर हिलोर लेता है


कभी तो अपना समंदर खंगालना होगा। -जहीर कुरेशी


41. आरियां खुश थीं कि बस दो-चार दिन की बात है


सूखते पेड़ों पर फिर से पत्तियां आने लगीं। -वीनस केसरी


42. सभी कहते थे वह प्यारा सरोवर सूख जायेगा


मगर देखा कि फिर उसमें कई सुन्दर कमल निकले। -वशिष्ठ अनूप


43. न कोई बाप न भाई, न कोई मां न बहन


हमारा तौर-तरीका बदल गया कितना। -एहतराम इस्लाम


44. अभी सांसें भी हैं जिंदा, अभी आंखों में सपने हैं


बहुत है बोझ सीने पर मगर शायद अभी कम है। -सुल्तान अहमद


45. धीरे-धीरे भीग रही हैं सारीं इंटें पानी में 


इनको क्या मालूम कि इनका आगे चलकर क्या होगा। -दुष्यंत कुमार


46. जाने कैसा था राब्ता उस से


वो मेरे साथ थी, जुदा भी थी। -हृदयेश मयंक


47. एक साया नजर से गुजरेगा


दर्द का जब बयान आयेगा। -अनिरुद्ध सिन्हा


48. थका-मांदा हुआ-सा वक्त अक्सर


कभी दिन में, कभी रातों में ठहरा। -विनय मिश्र


49. जगमगाता स्वरूप दे मुझको 


मेरे हिस्से की धूप दे मुझको। -धर्मेन्द्र गुप्त साहिल


50. आदतें, ढंग, नजर, पंख, उड़ानें बोली


खूब पहचानते हैं जाल विछाने-वाले। -देवेन्द्र आर्य


51. देखो अगर तो ऐश का सामान है मगर


सोचो तो सिर्फ दर्द की गठरी है जिंदगी। -पवन कुमार


52. फल रहा है पेड़ ये अमरूद का पहली दफा


फल पके तो, पास की लड़की चुरा ले जायेगी। -चन्द्रसेन विराट


53. एक धागे की बात रखने को


मोम का रोम-रोम जलता है। -बाल स्वरूप राही


 उल्लखित शेरों की तादाद आमतौर से देखें तो बड़ी मालूम होती है, लेकिन हिन्दी गजल के अब तक के किये-धरे के भरपूर प्रतिनिधित्व के लेहाज से विचार करें, तो काफी कुछ छूटा हुआ भी महसूस हो सकता है। कहना यह है कि इन शेरोंको उद्धरण के लिये लेते हए चयन के किसी खास माप-दण्ड को आधार नहीं बताया गया है, इनमें से अधिकतर तो ज्ञानप्रकाश विवेक की पुस्तक 'हिन्दी गजल दुष्यंत के बाद' से साभार हैं। बाकी जो वहां से नहीं है, उन्हें उपलब्धता के आधार पर ग्रहण किया गया है। इस सभी शेरों में, एक बात जो समानरूप से ध्यान खींचती है, वह उनका ताजा तरीन जीवन-बोध है, जिसे अपने समय और जीवन को जीने की इच्छा के बीच द्वंद्व में शामिल-शरीक रहते हुए अर्जित किया है, परिणामतः इनका स्वर किसी व्यक्ति के अपने दुख से उभ-चुभ होती कराह से अलग एक सर्वथा नयी और जीवंत-ऐसी आवाज है जिसमे आत्मीयता का पुट है और जो वस्तु-जगत के संदर्भ से हमें एक अलग एहसास देती है।


__ ज्ञान जी की जिस किताब से ऊपर कई शेरों का उल्लेख हुआ, उसी किताब में, कमलेश भट्ट कमल का निम्नलिखित शेर भी दर्ज है, इस शेर को आधार बनाकर विवेक जी का कथन है कि,-'कमलेश भट्ट कमल की गजल शब्द-छवियों से यात्रा करती हुई अर्थ-छवियों तक पहुंचती है, शेर इस प्रकार है


पेड़ पर चिड़ियों का डेरा बोलता है


शाम होते ही अंधेरा बोलता है।


मुझे इस शेर में खास बात उसकी कथन-भंगिमा लगती है, जिसके नतीजे में दोनों मिसरे-एक दूसरे का परस्पर प्रति-कथन बन जाते हैं, और शेर का अर्थ-संसार इसी द्वंद्व के बीच से आकार ग्रहण करता है। यहां, इस बाबत विस्तार से किसी बहस की गुंजाइश तो नहीं है, लेकिन ऊपर जिस 'प्रतिकथन', की बात आयी है उसे, और अर्थ जिस द्वंद्व से आकार ग्रहण कर रहा है, उसकी तरफ संकेत रूप में ही सही, कुछ कहना या शेर में उसे देख लेना जरूरी महसूस होता है। सर्वप्रथम पहली पंक्ति से चलें, तो शेर यह कहता है-


पेड़ पर, चिड़ियों का (जो) डेरा है, (वह) बोलता है (अर्थात् शिकायत करता है या आरोपित करता है कि) शाम होते ही (यानी जैसे ही शाम होना शुरू होती है) अंधेरा बोलने लगता है (यानी शोर-शराबा करने लगता है, हुल्लड़ या हुड़दंग आदि करने लगता है)।


सवाल उठ सकता है कि अंधेरा अगर यह सब करता भी है तो अपने तइं करता है, -इस पर 'चिड़ियों के डेरा' के आपत्ति उठाने, या शिकायत करने का क्या औचित्य है? इसका जवाब शाम होते ही' पद में है जिसको खोलने की जरूरत है- यानी यह सोचने की आवश्यकता है कि इस टुकड़े के जरिये शेर हमसे कहना क्या चाहता है?


(चिड़ियों के बारे में, और हम आदमियों के बारे में भी, -ज्यादातर, -आम मुशाहिदा यही है कि- हमें अपना डेरा या अपना घर छोड़कर दिन भर बाहर इसलिये रहना पड़ता है कि हम अपने पीछे अपने डेरे या अपने घर में जिन लोगों को छोडकर बाहर आये हैं, उनके लिये जीवनोपयोगी कुछ जुटा सकें। इस क्रम में हमारी घर वापसी अमूमन शाम होते-होते ही हो पाती है। यहां एक और नुक्ता हाथ यह लगता है कि -थके-मांदे, शाम को जब हम अपने ठिकाने पर वापस आते हैं तो अपने घर के बाकी सदस्यों के साथ और उनके बीच जिंदगी को अपने ढंग से, मुक्त होकर जीना चाहते हैं, क्योंकि इसी तरह के Relaxment इसी तरह के Easement से हमारी जिंदगी, सब कुछ भूल कर, आगे के लिये ताजा-दम या ऊर्जस्वित हो पाती है।)


इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रक्खें तो 'चिड़ियों के डेरे' के 'शाम होते ही' कहने का अर्थ-निहितार्थ खुल जाता है, और अंधेरे में बोलने पर उसके एतराज या आपत्ति का औचित्य भी सामने आ जाता है, अर्थात अब हम कह सकते हैं कि,-शाम होते ही अंधेरे के बोल पड़ने पर,-चिड़ियों के डेरे को-आपत्ति इसलिये है कि इससे, उसके (चिड़ियों के डेरे के)- अपने पारिवारिक या कौटुम्बिक जिंदगी को स्वाभाविक ढंग से जीने में खलल पड़ता है।


अब दूसरे मिसेर को लिया जाय। अंधेरे द्वारा 'शाम होते ही' कहने का अभिप्राय यह है कि-अंधेरे का ऐश्वर्य या पराकाष्ठा-उसके घटाटोप होने में-अर्थात घने से घना होने में है,-शाम जिसका आरंभिक चरण है। इस प्रकार, 'चिड़ियों के डेरे' के बोलने पर, अंधेरे को इसलिये एतराज या आपत्ति है कि, इससे उसके (अंधेरे के) स्वाभाविक रूप से अस्तित्व में आने में खलल या विघ्न पड़ रहा है।


___ यहां तक शेर के जिस अर्थ-निहितार्थ के सहारे हमारी पहुंच संभव हो सकी है, उसके लिये आलोच्य शेर की कथन-मंगिमा जिम्मेदार है। शेर में अर्थ का एक पहलू और है,-जिस तक पाठकगण, चिड़ियों का डेरा' और इसके बरअक्स 'अंधेरा' के प्रतीकार्थको 'जिन्दगी' और 'उसकी उलट या विपरीत शक्ति' के रूप में ऊपर के पैटर्न पर लेते हुए, स्वयं भी पहुंच सकते हैं। यहां अलग से यह कहने की जरूरत शायद नहीं है कि शेर का सौंदर्य उसकी तह-दर-तह अर्थवत्ता है जो कई चीजों को समेट कर खडी होती है।


कविता को लेकर, मेरा अब तक का निजी अनुभव यह है कि-कविता, चाहे जिस रूप या विधा से आयी हो-जीवन की समझ है। जीवन जिस तरह वस्तु-जगत के साथ अपने रिश्ते के महीन तंतुओं को पोषता, सींचता और जीवन-क्षम बनाता हआ आगे बढ़ने का एक चक्र रचता है -कविता भी ठीक उसी प्रकार शब्द-जगत से अपने संसर्ग में, विन्यास में, आये शब्दों में अर्थ के बारीक तंतुओं को रचती है और जीवन-जगत से अर्जित अनुभव के जरिये निरंतर उसे पोषती, सींचती, पुष्ट और समृद्ध करती हुई छतनार बनाने में लगी रहती है, फिर धूप चाहे जितनी भी कड़ी हो, -एक शीतल और घनी छांव का एहसास हमारी चेतना पर हर समय बना रहता है और इस प्रकार हमें थकान, बासीपन या ऊब से दूर तक निजात मिलती जाती है। बीज-अस्तित्व में कविता करुणा, यानी (यानी दूसरे की परवाह) है, इसलिये उसका स्वाभाविक-स्वर प्रतिरोध में प्रतिरक्षा का है। प्रतिरोध वह उस निरंकुश और वर्चस्व-मुखी ताकत का करती है जो अपने मनमाने हित को साधने के लिये जीवन-जगत को नियंत्रित सीमित और निहत्था बनाता है। अपने इसी प्रतिरोध में प्रतिरक्षा वह इसी नियंत्रित, सीमित और निहत्था बना दिये गये जीवन-जगत की करती है, क्योंकि वह उसी का 'स्वर' होती है। यहां अगर यह लगे कि यह कविता के स्वभाव या चरित्र का नहीं, बल्कि मार्क्सवादी-दृष्टिकोण की बात हो रही है तो कविता के इतिहास की तरफ रुख करना चाहिए-कम से कम वाल्मीकि का एक उदाहरण तो एकदम सामने का है कि-उन्होंने राम के ही पुत्रों से अपनी रचना का पाठ कराकर मर्यादा पुरुषोत्तम को, उन्हीं के राजमहल की भरी सभा में आईना दिखा दिया, तब तो न 'दास कैपिटल' लिखी गयी थी न ही स्त्री-विमर्श का जन्म हुआ था। वाल्मीकि का वह रचना-पाठ कराना, मामूली कारनामा नहीं है। क्या ऋषिवर के उक्त साहस में, उनकी रचनाशीलता की कोई भूमिका नहीं है? अगर कविता के इस स्वभाव, इस चरित्र की अर्थवत्ता हमारे अपने समय में तलाशने की जरूरत हो तो डॉ. केदारनाथ सिंह की कविता 'कवि कुम्भन दास के प्रति' को जरूर एक बार देखना चाहिए। यह उनके ताजा संग्रह 'सृष्टि पर पहरा' में संकलित है। कविता की अंतिम पंक्तियां यह सवाल छोड़ती हैं कि 'कविता' और 'सीकरी' के बीच आखिर कौन-सी ऐसी अनबन है कि सदियां गुजर गयीं लेकिन दोनो में आज तक नहीं पट सकी। पंक्तियां इस प्रकार हैं-


जानता हूं, समाधि से फूटकर


आता नहीं कोई उत्तर


फिर भी कविवर,-जाते जाते पूछ लूं


यह कैसी अनबन है


कविता और सीकरी के बीच


कि, सदियां, गुजर गयीं


और दोनों में आज तक पटी नहीं।


मार्क्सवाद का महत्व, रचना या साहित्य के परिप्रेक्ष्य में संक्षेपतः यह है कि वह कविता के इसी स्वभाव पर धार रखता है, उसे दृढ़ बनाता है, उसके सामाजिक सरोकार को निश्चितता और गहराई देता है, अपने समय में घटित हो रहे घटनाक्रमों को सही इतिहासबोध के आलोक में विश्लेषित करने और समझने का अवसर देता है। व्यक्ति और वस्तु-जगत के संबंधों-अन्तर्सबन्धों को उनके द्वंद्वात्मक परिप्रेक्ष्य में खोलने-देखने की दृष्टि देता है। परिणामतः चीजों को ग्रहण करने, नहीं करने के मामले में, हम अधिक तार्किक और औचित्यपूर्ण स्थिति में होते हैं-इस प्रकार-कुल मिलाकर मार्क्सवाद हमें अपनी 'नहीं' की तार्किक और वस्तुपरक समझ और इस समझ की अहमियत के बारे में शिक्षित करता और उसके इस्तेमाल के साहस से लैस करता है, जिससे अपने चौ-तरफा जगत में हम 'अकेलेपन' या 'निजत्व' के लिजलिजे-पन का शिकार हो कर रह जाने से बच जाते हैं, हम में समूह के प्रति दायित्वबोध जागता है, विकसित होता है और हम, अपेक्षाकृत अधिक उत्तरदायी बनते जाते हैं।


__काव्य-विधा के रूप में गजल की विशेषता, उसकी सांकेतिकता है। यानी उसका स्वभाव वर्णनात्मक या विवरणात्मक न होकर संश्लेषणात्मक या सघनता का है। भाषिक-मिव्ययिताप्रिय इस विधा में अभिव्यक्ति के स्तर पर-भाषा की रचनात्मक संभावनाओं के यथाशक्ति भरपूर संदोहन की अपेक्षा रहती है। उदाहरण के लिये जनश्रुति है, कि महाकवि गालिब,-एक मौके पर-मोमिन का एक शेर सुनकर फड़क उठे और उसकी तारीफ में यहां तक यह गये कि-इसे शेर के एवज में वह अपना पूरा दीवान छोड़ सकते हैं। सबको पता है कि मोमिन के उस शेर की कुल खूबी एक शब्द 'गोया' के अछूते इस्तेमाल की थी, या है। 'गोया' का अर्थ सामान्यत: यद्यपि, बोलना-बतियाना' आदि होने के साथ-साथ जैसे' भी हैं- 'जैसेयानी- 'तुम न होते हुए भी जैसे मेरे पास होते हो'-अर्थात् अपनी अनुपस्थिति में भी उपस्थित महसूस होते हो। इस स्थिति पर जानडन की एक पूरी कविता ही है, जिसे इस संदर्भ में देख लेना दिलचस्प होगा।


By absence this good means I again


That I can catch her


Where, none can match her


In some close corner of my braine


And, There I embrance and kiss her thus


Both I enjoy and miss her.


कविता का शीर्षक 'Present in absence' है। उल्लेखनीय यह नहीं, बल्कि यह देखना है कि, -मोमिन के शेर में सिर्फ एक शब्द गोया के रचनात्मक-इस्तेमाल ने जानडन की कविता के आशय या निचोड़ को किस प्रकार अपने में समाहित कर लिया हैंगजल की यही ताकत है। हमारी भावी गजलिया-आलोचना को यह समझते हुए आगे बढ़ना होगा। मोमिन का संबंधित शेर इस प्रकार है-


तुम मेरे पास होते हो गोया


जब कोई दूसरा नहीं होता


गजल के भाषिक-व्यवहार के इस खास अंदाज को गजल के कई हिन्दीविद्वान कलापक्ष से जडी कोई वस्त समझते हए नाक-भौं सिकोडते हैं और इससे अपना दामन ईमान की तरह बचाते हए गजर जाते हैं-यह उनका अपना यानी निजी मामला है। बात यह है कि अगर किसी चीज को अपनाना ही है तो, उसे क्यों न अपनी आंख को भरपूर खोलकर-उसके सही स्वरूप में और उसकी पूरी जीवंतता में स्वीकार करने की कोशिश करें।


गजल में, खास तौर पर उर्दू की गजल में,-'क्या कहा गया है' की तुलना में, - (उपरोक्त कारणों से) अधिक ध्यान, 'कैसे कहा गया है' पर दिया जाता है। अगर 'कैसे कहा गया है' के इस सवाल को, हम कहने या कथन करने की स्टाइल या शैली तक सीमित करके भी सोचें, तब भी भाषा को कमाने या कल्टीवेट करने का पहलू इससे जुड़ा रहता है। कविता चाहे जिस विधा में भी हो, भाषा को अपनी अभिव्यक्ति के लायक वह बनाती ही बनाती है और इस प्रक्रिया में विधा और रचनाकार की रचनात्मक-मनोभूमि की दुई चूंकि मिटी रहती है, परिणामस्वरूपइस प्रकार जो भाषा सामने आती है वह न तो एक-स्तरीय रह जाती है और न हीदैनन्दिन की भाषा की तरह अपना प्रयोजन पूरा करके बीच से हट या अनुपस्थित हो जाने वाली रह जाती है। हमारे निकट-पूर्व में मुक्तिबोध ने इसे सर्वाधिक निकट से देखा-परखा और समझ में आने वाले ढंग से बयान किया है। एक संदर्भ सेरचनाकार की ईमानदारी की शर्त लगाते हुए कहते हैं-काव्य रचना परिणाम है किसी पूर्वगत प्रदीर्घ मनःप्रक्रिया का, जो अलग-अलग समयों में बनती गयी और अपने तत्व एकत्र करती गयी'-आगे वह एक और बात कहते हैं,-'काव्य-रचना में जो अनायासता उत्पन्न होती है, वह केवल भाषा और छन्द के अभ्यास के नतीजे में उत्पन्न नहीं होती,-वरन् काव्य-रचना की पूर्वगत मनो-भूमिका की समृद्धि के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। ऊपर जो ‘कैसे कहा गया है' का सवाल गजल के बारे में आया है- मुक्तिबोध के कथन का बाद वाला अंश उसकी गहरे अर्थ में तस्दीक करता है। हिन्दी में गजल की भावी आलोचना को अपनी दृष्टि के विकास में, अब तक किये गये सभी संकेतों का संज्ञान लेते हुए आगे बढ़ना चाहिए।


इस आलेख में, हिन्दी गजल-रचना और उसकी आलोचना को ध्यान में रखते हुए जो भी संकेत किये जा सके हैं, उन्हें आलोचना-दृष्टि के विकास के किसी 'सेटफार्मूले' के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, यह कार्य, धैर्यपूर्वक सीखते और अपनी इस सीख की परीक्षा कराते हुए आगे बढ़ने का है जो अपनी प्रक्रिया में बहुत कुछ समेटता है और जिसमें रचना की पढ़ने का तौर-तरीका भी शामिल है। इसलिये इसे धैर्य और समय दोनों की दरकार है। अतएव जरूरी है कि समय की आवश्यकता को गंभीरतापूर्वक पहचानते हुए गजल के नये-पुराने रचनाकारों के बीच से कुछ लोग आगे आयें और इस विधा के विभिन्न पहलुओं पर अपने अनुभव अधिक से अधिक रचनाधर्मियों के बीच साझा करें ताकि इस विधा को लेकर विमर्श का एक स्वस्थ वातावरण बन सके और चीजें छन कर. तथा अधिसंख्य गजल रचनाकारों की विचारणा और सम्मति से पष्ट होकर आयें और अपनायी जायें ताकि हिन्दी गजल के गुण-दोष को लेकर व्यवहारिक स्तर पर तर्क-सम्मत रच.०२नात्मक आचरण संभव हो।