आलेख हिन्दी गजलों का रचनात्मक मिजाज

आलेख


राधेलाल बिजधावने


किसी भी देश की संस्कृति एवं सभ्यता में समय-समय पर परिवर्तन होते ही रहते हैं। इन सभ्यता संस्कृतियों के सम्मिलन की वजह सम्मिश्रण के साथ आपसी समन्वय भी होता ही है। इसलिए भी कि हर देश के साहित्य के रूपों में रचनात्मक बदलाव होता ही रहता है।


हिन्दी साहित्य में त्रिलोचन, निराला, शमशेर बहादुरसिंह ने गजलें लिखना और उसके रचनात्मक रूप को नया अंदाज दिया। यद्यपि इनकी गजलों को तत्समय गजल नहीं माना जाता अनुगीत के रूप में स्वीकारा गया है।


वास्तव में गजल अरब देश से चलकर ईरान होती हुई भारत आई । गजल का रचनात्मक विन्यास अलग-अलग देशों की साहित्यिक रचनात्मक समन्वय का परिणाम है। उर्दू गजल और हिन्दी का रचनात्मक स्तर पर सजातीय रिश्ता मान्य किया गया है।


जब गजलें उर्दू भाषा में आईं तो इसको स्थापित होने में लगभग सौ वर्ष का समय लगा। गजलें राजा महाराजाओं और अभिजात्य वर्ग की शान शौकत से जुड़कर राजा महाराजाओं के प्रश्रय में विकसित हुई और इसे यहीं से बहुत सम्मान भी प्राप्त हुआ। इस समय राजाओं, सामंतों से प्रश्रय से गजलों में रूमानी संवदेना की प्राथमिकता एवं प्रधानता मिली।


वैसे हिन्दी के मिजाज की आधुनिक गजलें भारतेंदु की कविताओं के साथप्रस्तुत होती रही हैं। डॉ रामविलास शर्मा ने गजल निकायों को सामंती कार्य माना है।


गजलें सामंती और राज दरबारों के साथ कोठों में चली गईं। जो पूरी मस्ती से मुजरों के समय गायी जाती रही है। निःसंदेह हिन्दी गजल उर्दू की ऋणात्मकता को कभी अस्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि वह उर्दूभाषा से ही हिन्दी में आयी हैइसलिए उर्दू भाषा की गजलों की ही तरह हिन्दी गजलों की संवेदना भी रूमानी संवेदना की थीं।


गजल का काव्य रूप अपनी विभिन्नता लिये हुए हैं। बहर एवं प्रासों से ही गजलों के रूप को संवारा जाता है । गजलों में रदीफ, काफिये और बहरों के सहारे ही गजलों को पूर्ण रूप प्रदान किया जाता है जिसे गजल का व्याकरण माना गया है। गजलों में रदीफ एवं काफिये सही नहीं होने से गजल के स्वरूप को स्वीकारा नहीं जा सकता।


__गजलों में कहन का अंदाज महत्वपूर्ण है। कहन सही नहीं होगी तो गजल, गजल नहीं रह पायेगी। यही गजल पेचीदगियों और अनुभूत तारतम्य ही गजलों को कालजयी बनाता है इसलिए गजलों में सारतत्व को खोजने की कोशिश जरूरी है। इसके लिए लंबी साधना की जरूरत है।


फैज अहमद फैज का कथन है कि अच्छी शायरी करने के लिए तकलीफ और गम जरूरी है। तकलीफों से ही शायरी में जिंदगी की असलियत आ पाती है भी मानते हैं कि-अच्छी शायरी वह है जो कला के निकष पर ही नहीं, जिंदगी की असलियत भी हो। जिंदगी में अन्याय, अत्याचार उत्पीड़न भूख गरीबी बदहाली अज्ञानता संकीर्णता दंस, वैभव सामंती अतिवाद दबावों से ही शायरी के रूप में बेहतरी और प्रभावोत्पादकता आती है क्योंकि विडंबनाओं की वजह ही गजलों का रूप विकसित हआ है।


__हिन्दी में दुष्यंत कुमार ने गजलों को संघर्ष और प्रतिरोध की ताकत दी। दुष्यंत कुमार तथा अदम गोंडवी ने हिन्दी गजलों को प्रभावी रचनात्मक रूप दिया है। अठारहवीं सदी में मीर ने मौजूदा जिंदगी को प्रमाणित करने वाली गजलें लिखींमीर को जो पीड़ा समंदर सी गहरी लगी उसी तरह की दुष्यंत कुमार की गजलों की पीडा भी समंदर की तरह गहरी एवं विस्तृत महसूसी गयी


उर्दू गजलों में उस्ताद एवं शिष्य परंपरा रही है, इसलिए उसमें परिपक्वता एवं उर्दू ग्रामर की परंपरा का निर्वहन होता है। हिन्दी की गजलों में गुरू शिष्य परंपरा नहीं होने से हिन्दी गजलों में व्याकरण की दृष्टि से अनेक कमियां महसूसी जाती रही हैंउर्दू अदब के रचनाकार हिन्दी गजलों को, गजल ही नहीं मानते दुष्यंत कुमार की गजलों को भी वे गजल नहीं मानते। हिंदी गजलों में बहुत सी बंदिशें ऐसी हैं जिन्हें तोड़ा जाता रहा है।


एक गजलकार के लिए यह जरूरी है कि उसका भाषा पर पूरा अधिकार हो। जिसकी भाषा में पैठ नहीं है, उसे गजल नहीं लिखना चाहिए।


गजलों की अनेक बहर हैं। परंतु 19 बहर (छंद) को गजलकार स्वीकार करते हैं। गजलों सात आठ बहर यानी की छंद ऐसे हैं, जिसमें हर गजलकार आसानी गजल लिख सकता है। जो गजलकार ज्यादा परिपक्व होता है वह बारह बहर की अच्छी गजलें लिख सकता है। बारह से 19 तक की बहरें क्लासिक हैं। जिसमें सही गजलें लिख पाना आसान नहीं। आलोचना सही गजल लिखने के लिए अनुभव और विवेक प्रदान करती है क्योंकि आलोचना भी एक तरह का सृजन कर्म ही है।


हिन्दी में अनेक गजलकार हुए हैं-जैसे बल्लीसिंह चीमा, नचिकेता, ज्ञान प्रकाश विवेक, माधव सिंह, कौशिक, अरविंद त्रिपाठी, मृदुला अरुण, हरेराम समीपश्रीधर मिश्र, अदम गौडवी, ब्रजेश पांडेय, पुरुषोत्तम प्रतीक, प्रभा दीक्षित, कमल किशोर श्रमिक, रामकुमार कृषक हैं ही जो इसके साथ गजल के आलोचक भी हैं जिन्होंने हिंदी गजलों के रचनात्मक मिजाज पर अच्छी साफ सुथरी आलोचना लिखी है।


अनेक आलोचकों का मत है कि हिन्दी गजलों की दशा-दिशा भ्रमित एवं त्रुटिपूर्ण है।


___ बल्लीसिंह चीमा ने अपनी गजलों में किसानों की संघर्ष चेतना को प्रस्तुत किया। इनकी गजलों का अपना टेक्सचर है।


___ अदम गौंडवी भी प्रगतिशील चेतना के किसान गजल लेखक हैं । ये ग्रामीण अंतर्विरोध, विडंबनाओं, रूढ़िवाद अंधविकासों की त्रासदियों को गजलों में प्रस्तुत करते हैं क्योंकि इनके पास जुझारू जनचेतना है।


रघुवीर सहाय फिराक गजलों को असंबद्ध कविता मानते हैं जबकि रामविलास शर्मा गजलों को सामंती विधा मानते हैं।


___ माधव कौशिक की गजलें-अनुभूति के खानाबदोश इलाकों की खेतों की है जिनमें बेचैनी अधिक है। ये चेतना संपन्न गजलकार हैं। ये टूटते रिश्तों की वेदना को समझते हैं।


रामकुमार कृषक पिछले 40 वर्षों से गजलें लिख रहे हैं। इनकी गजलें बदले हुए प्रतिमानों की हैं। ये छोटे-बड़े सबल-निर्बल शोषण शोषितों के जीवन के दुखद अहसासों को गजलों में दर्ज करते हैं। स्त्री जीवन की दुखद यातना, करुणा का प्रतिरोधी स्वर इनकी गजलों में प्रस्तुत हुआ है।


___ मृदुला अरुण की गजलें उर्दू की जमीन पर स्थित हैं। इनकी गजलें प्रेम मूलक हैं। जबकि ज्ञान प्रकाश विवेक की गजलों में समकालीनता का बीजत्व है। इनमें जीवन का संत्रास है।


अदम गौंडवी की गजलों का द्वैत विस्तृत है। ये धर्म राजनीति, साम्प्रदायिकता दलित चिंतन कर्म-पांखड शोषण के विषयों पर गजलों की प्रस्तुत करते हैं।जबकि ज्ञान प्रकाश विवेक की गजलें सामाजिक विक्षोभ, राजनीतिक उद्वेग के मोहभंग भी हैं।


पुरुषोत्तम प्रवीण्य की गजलों में युग की अनुभूति ध्वनित होती है। ये इतिहास बोध के तीक्षण गजलकार हैं।


हरेराम समीप की गजलों में समग्र समाज की विसंगतियां हैं। ये अनुभूति की प्रमाणिकता को सर्टिफाइड करते हैं।


कमल किशोर श्रमिक की गजलों में सामाजिक राजनैतिक सांस्कृतिक परिवर्तन की सक्रियता प्रतिबिंबित होती है। ये कुंठा, निराशा, बेबसी, उत्पीड़न स्वार्थपूर्ण नीतियों को केंद्र में रखकर गजलें लिखते हैं जिनमें श्रमिक विद्रोह की टोन होती है।


सुरेन्द्र श्लेष की गजलें वेदना की भाषा बोलती हैं। जिनमें आम आदमी को दर्द की तलखी है। सुरेन्द्र श्लेष धर्म की उंगली पकड़ चलना पसंद नहीं करते। तमाम कमियों के बावजूद सुरेश श्लेष की गजलें समकालीन हिन्दी गजलों की भावधारा को चेतना से जोड़ती हैं।


- दुष्यंत कुमार की गजलें सर्वप्रथम कहानी पत्रिका, सारिका में प्रकाशित हुई। 'साये में धूप' इनका गजल संग्रह आया। दुष्यंत कुमार की गजलों ने हिन्दी गजलों को प्रगतिशील विचारधारा की तरफ मोड़ा और गजलों से धुंध को साफ किया


तमाम शुरूआती कमजोरियों के बावजूद हिन्दी गजलों का नया मुहावरा विकसित किया है। इसका श्रेय दुष्यंत कुमार को जाना स्वाभाविक ही है क्योंकि इनकी गजलों में जीवन की यथार्थपरक समीक्षा है। इनकी गजलों में संघर्ष है।


"आलोचना की यात्रा में हिन्दी गजल" संग्रह के डॉ. जीवनसिंह ने हिन्दी गजलों के शुरुआती दौर की गजलों से आज तक की गजलों के मिजाज को बहुत स्पष्ट एवं निरपेक्ष ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कहा जा सकता है कि इन्होंने हिन्दी गजलों का इतिहास लिखा है और उसे खंगाला भी है।